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मुक्तिनाथ मंदिर: क्या है 108 बैल मुखों से बहने वाले जल का रहस्य?

मुक्तिनाथ मंदिर: क्या है 108 बैल मुखों से बहने वाले जल का रहस्य?

नेपाल के मुस्तांग जिले में बसा मुक्तिनाथ मंदिर हिंदुओं और बौद्धों का पवित्र तीर्थस्थल है, मुक्तिनाथ मंदिर (मुक्तिधाम) में 108 बैल मुखों से बहने वाले पवित्र जल का रहस्य हिंदू और बौद्ध धर्म की आध्यात्मिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह मंदिर नेपाल के मस्तांग जिले में 3,760 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और इसे वैष्णव सम्प्रदाय के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। यहाँ के 108 बैल मुखों (गोमुखों) से बहने वाला जल न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि इसके पीछे कई पौराणिक और प्राकृतिक रहस्य भी हैं।

हिंदू धर्म में संख्या 108 को अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह संख्या वेदों, उपनिषदों और पुराणों में कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है, जैसे 108 उपनिषद, 108 माला के मनके, और 108 पवित्र स्थल। मुक्तिनाथ मंदिर के बाहरी प्रांगण में 108 बैल मुखों से बहने वाला जल सभी 108 श्री वैष्णव दिव्य देशमों (पवित्र तीर्थ स्थानों) से संबंधित पुष्करिणी जल का प्रतीक माना जाता है। इन बैल मुखों से निकलने वाला जल पवित्र पुष्करिणी जल कहलाता है, जो भक्तों के लिए आध्यात्मिक शुद्धि का साधन है। माना जाता है कि इस जल में स्नान करने से व्यक्ति पापों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।

आपको बता दें मुक्तिनाथ मंदिर को गंडकी शक्ति पीठ के रूप में भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह किया, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर को 51 भागों में विभक्त किया। माना जाता है कि माता सती का सिर गंडकी नदी के तट पर गिरा, जिसके कारण यह स्थान गंडकी चंडी और भगवान विष्णु को चक्रपाणि के रूप में पूजा जाता है। 108 बैल मुखों से बहने वाला जल गंडकी नदी से जुड़ा है, जो शालिग्राम पत्थरों के लिए प्रसिद्ध है। ये पत्थर भगवान विष्णु का स्वरूप माने जाते हैं, और इस जल को इन पत्थरों के साथ जोड़ा जाता है, जो इसे और पवित्र बनाता है।

पौराणिक कथा मे कहते हैं कि भगवान विष्णु को जलंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से मुक्ति यहीं मिली थी। इसीलिए इसे 'मुक्तिनाथ' कहा जाता है। मंदिर के बाहर 108 बैल मुखों से बहता पवित्र जल सभी वैष्णव तीर्थों के पुष्करिणी जल का प्रतीक है।भक्त इन मुखों के नीचे स्नान करते हैं, भले ही पानी बहुत ठंडा हो। यह स्नान पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का प्रतीक है। भक्तों का भी मानना है कि इस जल में स्नान करने से न केवल पापों से मुक्ति मिलती है, बल्कि यह जीवन और पुनर्जन्म के चक्र से भी छुटकारा दिलाता है। यह रहस्यमयी जलधाराएं मुक्तिनाथ को एक अनूठा और पवित्र तीर्थस्थल बनाती हैं।

मुक्तिनाथ की यात्रा रोमांचक और चुनौतीपूर्ण

बता दें यहां पहुचना आसान नही होता "मुक्तिनाथ की यात्रा जितनी आध्यात्मिक है, उतनी ही रोमांचक और चुनौतीपूर्ण भी है, यह मंदिर थोरोंग-ला दर्रे के पास है, जो दुनिया के सबसे ऊंचे दर्रों में से एक है। पैदल यात्रा में हिमालय की खतरनाक चढ़ाई और ठंडी हवाएं आपके साहस की परीक्षा लेती हैं। कागबेनी और जोमसोम के रास्ते में आपको तिब्बती गांव, बर्फीली चोटियां और काली गंडकी नदी का शांत प्रवाह देखने को मिलेगा। मंदिर के पास मेबर लखांग गोम्पा में प्राकृतिक रूप से जलती अग्नि और बहता जल एक अलौकिक अनुभव देता है। क्या यह ब्रह्मा के यज्ञ का स्थान है? ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी और बदलता मौसम यात्रा को जोखिम भरा बनाता है। लेकिन यही जोखिम इसे अविस्मरणीय बनाता है!" सबसे अच्छा समय मार्च से मई और सितंबर से नवंबर है, जब मौसम सुहावना होता है।

कैसे पहुंचें

दिल्ली, कोलकाता या वाराणसी से काठमांडू तक फ्लाइट (लगभग 1.5 घंटे), फिर पोखरा और जोमसोम तक 20 मिनट की फ्लाइट। काठमांडू से पोखरा (6-8 घंटे), फिर जोमसोम तक बस या जीप। वहां से कागबेनी और मुक्तिनाथ तक पैदल या जीप। पोखरा या जोमसोम से हेलिकॉप्टर द्वारा 1 दिन में यात्रा पूरी की जा सकती है। जोमसोम और कागबेनी में निजी लॉज उपलब्ध हैं, जो बुनियादी सुविधाएं प्रदान करते हैं। स्लिपिंग बैग साथ रखें। भारतीयों के लिए वीजा जरूरी नहीं, लेकिन मतदाता पहचान पत्र या पैन कार्ड साथ रखें। RCTC का 'बेस्ट ऑफ नेपाल' पैकेज 5-6 दिन का है, जिसमें काठमांडू, पोखरा और मुक्तिनाथ शामिल हैं। कीमत लगभग 40,000-46,400 रुपये प्रति व्यक्ति।

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