भारत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) भूषण रामकृष्ण गवई ने केंद्रीय कानून मंत्रालय को पत्र लिखकर जस्टिस सूर्यकांत को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने की सिफारिश की है। यह सिफारिश परंपरा के अनुरूप है, जिसमें सेवानिवृत्त होने वाले सीजेआई द्वारा सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश का नाम प्रस्तावित किया जाता है। यदि केंद्र सरकार की मंजूरी मिल जाती है, तो जस्टिस सूर्यकांत 24 नवंबर 2025 से पदभार संभालेंगे और 9 फरवरी 2027 तक कार्यरत रहेंगे, यानी लगभग 14 माह का कार्यकाल।
न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले 'मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर' (एमओपी) के तहत यह सिफारिश की गई है। सीजेआई गवई का कार्यकाल 23 नवंबर 2025 को समाप्त हो रहा है, और सरकार ने 23 अक्टूबर को ही उन्हें सिफारिश भेजने का अनुरोध किया था। सूत्रों के अनुसार, सीजेआई गवई ने सिफारिश का एक प्रति जस्टिस सूर्यकांत को भी सौंप दिया है। केंद्र सरकार अब इस प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजेगी, और औपचारिक अधिसूचना जारी होने के बाद नियुक्ति पूरी हो जाएगी। यह प्रक्रिया आमतौर पर सेवानिवृत्ति से एक माह पहले शुरू हो जाती है, जो इस बार भी निर्बाध रूप से चली।
जस्टिस सूर्यकांत का जन्म 10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे, और परिवार में कानून का कोई पारंपरिक पृष्ठभूमि नहीं थी। बचपन में गांव के ही स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने 1981 में हिसार के गवर्नमेंट पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद 1984 में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से विधि स्नातक (एलएलबी) की उपाधि प्राप्त की। बाद में, 2011 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से परास्नातक (एमए) की डिग्री भी हासिल की, जो उनकी शैक्षणिक उत्कृष्टता को दर्शाती है।
कानूनी करियर की शुरुआत जस्टिस सूर्यकांत ने हिसार जिला अदालत में वकालत से की। 1985 में वे चंडीगढ़ चले गए, जहां पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में अभ्यास करने लगे। संवैधानिक, सेवा संबंधी और सिविल मामलों में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद, उन्होंने विश्वविद्यालयों, बोर्डों, निगमों, बैंकों और उच्च न्यायालयों का प्रतिनिधित्व किया। 2000 में मात्र 38 वर्ष की आयु में हरियाणा के सबसे युवा महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) नियुक्त होने का सम्मान प्राप्त किया, जो उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। मार्च 2001 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा दिया गया।
न्यायिक यात्रा की शुरुआत 9 जनवरी 2004 को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में हुई। यहां उन्होंने 14 वर्षों से अधिक समय तक सेवा दी। अक्टूबर 2018 में उन्हें हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति 24 मई 2019 को हुई, जहां वे वर्तमान में दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश हैं। इसके अलावा, वे सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमिटी के चेयरमैन भी हैं और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की गवर्निंग बॉडी के सदस्य रह चुके हैं।
जस्टिस सूर्यकांत के न्यायिक योगदान को उनके द्वारा सुने गए कई ऐतिहासिक मामलों से समझा जा सकता है। वे संतुलित और शांत स्वभाव के लिए जाने जाते हैं, जो विवादास्पद मुद्दों पर भी निष्पक्ष निर्णय लेने में सहायक सिद्ध होता है। 2023 में अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण को वैध ठहराने वाली पांच सदस्यीय पीठ का हिस्सा थे, जिसने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा समाप्त करने के केंद्र के फैसले को बरकरार रखा। 2024 में असम से संबंधित नागरिकता मुद्दों पर धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को मंजूरी दी। उसी वर्ष अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के अल्पसंख्यक दर्जे पर पुराने फैसले को पलटते हुए पुनर्विचार की अनुमति दी।
2022 में वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) योजना की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, जो सशस्त्र बलों के कर्मियों के लिए महत्वपूर्ण था। इसी वर्ष पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में चूक के मामले में जांच समिति गठित करने वाली पीठ में शामिल थे। इन निर्णयों से स्पष्ट है कि जस्टिस सूर्यकांत संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक सुधारों पर गहन चिंतन रखते हैं।
इस नियुक्ति का महत्व कई स्तरों पर है। सबसे पहले, हरियाणा से पहला सीजेआई होने से उत्तरी भारत के इस राज्य को न्यायिक नेतृत्व में प्रतिनिधित्व मिलेगा, जो विविधता को बढ़ावा देगा। दूसरा, वरिष्ठता की परंपरा का पालन सुनिश्चित करेगा, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत करता है। हालांकि उनका कार्यकाल छोटा (14 माह) है, लेकिन इस दौरान वे लंबित मामलों के निपटारे, न्यायिक सुधारों और डिजिटल न्याय प्रणाली को गति देने पर फोकस कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जस्टिस सूर्यकांत का शांतिपूर्ण दृष्टिकोण विवादास्पद मुद्दों जैसे नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) या चुनावी बॉन्ड्स जैसे मामलों में संतुलन ला सकता है।
न्यायपालिका के इतिहास में सीजेआई की भूमिका सर्वोपरि रही है। वे न केवल सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली को निर्देशित करते हैं, बल्कि संविधान की रक्षा में संरक्षक की भूमिका निभाते हैं। जस्टिस सूर्यकांत का आगमन ऐसे समय हो रहा है जब कोर्ट में 50 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, और न्यायिक नियुक्तियों पर बहस तेज है। उनकी नियुक्ति से उम्मीद है कि युवा वकीलों को प्रेरणा मिलेगी, खासकर उन लोगों को जो गैर-कानूनी पृष्ठभूमि से आते हैं।



