केंद्र सरकार के करीब 50 लाख कर्मचारियों और 69 लाख पेंशनभोगियों की उम्मीदों को झलस मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय कैबिनेट ने मंगलवार को 8वीं केंद्रीय वेतन आयोग के संदर्भ शब्दों (टर्म्स ऑफ रेफरेंस - ToR) को मंजूरी दे दी है। यह फैसला वेतन, पेंशन और भत्तों में संशोधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो 1 जनवरी 2026 से प्रभावी होने की उम्मीद है।
केंद्रीय वेतन आयोग भारत सरकार का एक स्वायत्त निकाय है, जो हर दस साल में केंद्रीय कर्मचारियों के वेतनमान, पेंशन और अन्य लाभों की समीक्षा करता है। स्वतंत्रता के बाद से अब तक सात आयोग गठित हो चुके हैं। सातवां वेतन आयोग 1 जनवरी 2016 से लागू हुआ था, जिसने फिटमेंट फैक्टर 2.57 के साथ औसतन 14-23% की वृद्धि की थी। इसी तरह, आठवां आयोग 2026 के लिए लंबित था, लेकिन राजनीतिक और आर्थिक कारणों से इसकी घोषणा जनवरी 2025 में हुई। अब ToR की मंजूरी के साथ आयोग औपचारिक रूप से सक्रिय हो गया है।
आयोग का गठन: अध्यक्ष और सदस्य कौन?
आयोग की अध्यक्षता रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज रंजना प्रकाश देसाई करेंगी, जिनकी न्यायिक विशेषज्ञता वित्तीय और प्रशासनिक मुद्दों पर गहन विश्लेषण सुनिश्चित करेगी। पार्ट-टाइम सदस्य के रूप में आईआईएम बैंगलोर के प्रोफेसर पुलक घोष शामिल हैं, जो आर्थिक मॉडलिंग में माहिर हैं। सदस्य सचिव के पद पर पेट्रोलियम सचिव पंकज जैन होंगे। यह टीम आयोग को बहुआयामी दृष्टिकोण प्रदान करेगी, जिसमें निजी क्षेत्र के वेतन, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लाभ और राज्य सरकारों के वित्त पर प्रभाव शामिल है।
ToR के अनुसार, आयोग देश की आर्थिक स्थिति, राजकोषीय सतर्कता, विकास व्यय के लिए संसाधनों की उपलब्धता, गैर-अंशदायी पेंशन योजनाओं की अनफंडेड लागत और राज्य वित्तों पर प्रभाव का मूल्यांकन करेगा। यह दस्तावेज आयोग को न केवल वेतन बढ़ाने का आधार देगा, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं को मजबूत करने पर भी जोर देगा।
वेतन और पेंशन में कितनी बढ़ोतरी?
कर्मचारियों की नजरें सबसे ज्यादा फिटमेंट फैक्टर पर हैं, जो मौजूदा वेतन को गुणा करके नया वेतनमान तय करता है। सातवें आयोग में यह 2.57 था, जिससे न्यूनतम वेतन 7,000 से बढ़कर 18,000 रुपये हो गया था। आठवें आयोग के लिए विशेषज्ञ 1.83 से 2.46 के बीच अनुमान लगा रहे हैं। यदि 2.0 का फैक्टर अपनाया जाता है, तो औसत वेतन में 20-25% की वृद्धि हो सकती है। उदाहरण के तौर पर:
- एक लेवल-1 कर्मचारी का मौजूदा मूल वेतन 18,000 रुपये है। 2.0 फिटमेंट पर यह 36,000 रुपये हो सकता है।
- लेवल-10 (जैसे सेक्शन ऑफिसर) का 56,100 रुपये का वेतन 1,12,200 रुपये तक पहुंच सकता है।
- पेंशनभोगियों को भी समान अनुपात में लाभ मिलेगा, जिससे मासिक पेंशन में 15-30% की बढ़ोतरी संभव है।
हालांकि, अंतिम फैक्टर आयोग की रिपोर्ट और कैबिनेट की मंजूरी पर निर्भर करेगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, "अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर तारीख तय होगी, लेकिन ज्यादातर 1 जनवरी 2026 ही रहेगी।" यह वृद्धि न केवल कर्मचारियों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाएगी, बल्कि उपभोग बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को गति भी देगी।
समयसीमा: 2026 या 2028?
आयोग को गठन के 18 महीने के अंदर रिपोर्ट सौंपनी है, यानी अप्रैल 2027 तक। सरकारी इरादा 1 जनवरी 2026 से पूर्वव्यापी प्रभाव का है, लेकिन वास्तविकता अलग है। जनवरी 2025 में घोषणा के बावजूद ToR की मंजूरी अक्टूबर तक टल गई, जो सामान्य 10 महीने पहले गठन की परंपरा से विपरीत है।
विशेषज्ञों के अनुसार, रिपोर्ट के बाद कैबिनेट की समीक्षा, संसदीय बहस और बजट प्रक्रिया में 12-18 महीने लग सकते हैं। छठे और सातवें आयोग के इतिहास से सबक लेते हुए, कई विश्लेषक 2028 की शुरुआत तक पूर्ण कार्यान्वयन की भविष्यवाणी कर रहे हैं। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि देरी के कारण कर्मचारी और पेंशनभोगी 2028 तक इंतजार कर सकते हैं। केंद्रीय सचिवालय सेवा फोरम ने 2026 से लागू करने की मांग की है, लेकिन देरी आर्थिक अनिश्चितताओं और चुनावी कैलेंडर से जुड़ी हो सकती है।
कर्मियों और लाखों पेंशनभोगियों को क्या लाभ?
यह आयोग 47 लाख सिविल कर्मचारियों, 14 लाख रक्षा कर्मियों और लाखों पेंशनभोगियों को प्रभावित करेगा। वेतन वृद्धि से खुदरा मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहने की उम्मीद है, लेकिन राज्य सरकारें, जो आमतौर पर सिफारिशें अपनाती हैं, वित्तीय दबाव महसूस करेंगी। ToR में राज्यों के प्रभाव का मूल्यांकन शामिल होने से संघीय संतुलन बनेगा।
कर्मचारी यूनियनों ने स्वागत किया है, लेकिन पूर्ण गठन और समयबद्ध रिपोर्ट की मांग की है। राष्ट्रीय संगठन ने कहा, "यह लाखों परिवारों के लिए राहत है, लेकिन देरी न हो।" आर्थिक रूप से, 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त व्यय हो सकता है, जो विकास परियोजनाओं को प्रभावित करेगा।



