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काशी में मणिकर्णिका घाट पर बाढ़ का कहर: छतों पर जल रही हैं चिताएं, लाशों की लंबी कतार

काशी में मणिकर्णिका घाट पर बाढ़ का कहर: छतों पर जल रही हैं चिताएं, लाशों की लंबी कतार

भगवान शिव की नगरी काशी के मणिकर्णिका घाट पर बढ़ के कारण बुरे हाल है, घाट के अधिकांश शवदाह प्लेटफॉर्म जलमग्न हो चुके हैं, और अब छतों पर अस्थायी श्मशान बनाकर अंतिम संस्कार किए जा रहे हैं। शवयात्रियों को लाशों के साथ घंटों इंतजार करना पड़ रहा है, लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे है और एक साथ 8-10 चिताएं जल रही हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक वाराणसी में गंगा का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। 2 अगस्त 2025 को गंगा का जलस्तर 70.36 मीटर तक पहुंच गया, जो चेतावनी बिंदु (70.262 मीटर) से 10 सेंटीमीटर ऊपर है और खतरे के निशान (71.262 मीटर) की ओर बढ़ रहा है। इस बाढ़ ने काशी के 84 घाटों में से अधिकांश को जलमग्न कर दिया है, जिसमें मणिकर्णिका घाट भी शामिल है। घाट के पांच शवदाह प्लेटफॉर्म में से तीन पूरी तरह डूब चुके हैं, और शेष दो पर भी पानी का दबाव बढ़ रहा है।

इसके चलते, मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार करने के लिए अब छतों का सहारा लिया जा रहा है। घाट से करीब 15 फीट ऊपर बने रूफटॉप श्मशान में एक साथ 5 से 10 शवों का दाह संस्कार हो रहा है। इससे पहले आम दिनों में जहां इस घाट पर प्रतिदिन 100 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार होता था, वहीं बाढ़ के कारण अब यह संख्या घटकर 30-50 तक रह गई है। बाढ़ ने न केवल मणिकर्णिका घाट, बल्कि पूरे वाराणसी को प्रभावित किया है। 15 गांव और शहर के 10 मोहल्ले जलमग्न हैं, और 436 परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं। गंगा आरती के स्थान बदल दिए गए हैं, और कई छोटे-बड़े मंदिरों में पानी भर गया है। पंडा-पुरोहितों की 300 से अधिक चौकियां डूब चुकी हैं, जिससे उनकी आजीविका पर भी संकट आ गया है। डोमराजा परिवार, जो मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को संचालित करता है, वो भी इस स्थिति से परेशान है। डोम परिवार के राजेश चौधरी के अनुसार, बाढ़ ने दाह संस्कार की संख्या को आधा कर दिया है, और अव्यवस्था के कारण काम करना और भी मुश्किल हो गया है।

शवयात्रियों की परेशानी

बाढ़ ने शवयात्रियों के लिए भारी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। घाट की गलियों में नावें चल रही हैं, और शवों को छतों तक ले जाने के लिए कमर भर पानी से होकर गुजरना पड़ रहा है। शवयात्रियों को अंतिम संस्कार के लिए 2 से 8 घंटे तक इंतजार करना पड़ रहा है। कई बार जगह की कमी के कारण शवों को एक के ऊपर एक रखना पड़ रहा है। लोग कफन में लिपटी लाशों के बीच बैठकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, और जल चुकी चिताओं पर नजर रख रहे हैं ताकि उनकी बारी छूट न जाए।

मणिकर्णिका घाट की गलियों में अव्यवस्था का आलम है। गंगा के तेज बहाव और कीचड़ ने घाटों को और मुश्किल बना दिया है। लकड़ी की दुकानें भी डूब चुकी हैं, जिससे दाह संस्कार के लिए लकड़ी की उपलब्धता कम हो गई है। चंदन जैसी महंगी लकड़ियों की कीमतें और बढ़ गई हैं, जिससे व्यापारियों और शवयात्रियों को आर्थिक नुकसान हो रहा है।

मणिकर्णिका घाट का धार्मिक महत्व

मणिकर्णिका घाट का धार्मिक महत्व अनुपम है। काशी खंड के अनुसार, इस घाट पर मृत्यु को मंगलकारी माना जाता है। मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार होने पर भगवान शिव स्वयं मृत आत्मा को तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार, माता पार्वती के कान का मणि इस स्थान पर गिर गया था, जिसके कारण इस घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा। यह भी कहा जाता है कि माता पार्वती ने श्राप दिया था कि इस घाट की चिताओं की अग्नि कभी नहीं बुझेगी, और यही कारण है कि यहां 24 घंटे चिताएं जलती रहती हैं। हालांकि, बाढ़ की स्थिति ने इस पवित्र परंपरा को भी प्रभावित किया है। घाट पर सन्नाटा पसरा है, और छतों पर जल रही चिताएं एक दर्दनाक दृश्य प्रस्तुत कर रही हैं। पंडा-पुजारी, जो सामान्य दिनों में पूजा-पाठ और अंतिम संस्कार की व्यवस्था करते हैं, अब खाली बैठे हैं। विदेशी पर्यटक, जो गंगा आरती और घाट की सांस्कृतिक झलक देखने आते हैं, भी इस स्थिति से निराश हैं।

अन्य घाटों की स्थिति

मणिकर्णिका के अलावा, हरिश्चंद्र घाट, अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, और अन्य कई घाट भी बाढ़ की चपेट में हैं। हरिश्चंद्र घाट पर भी शवदाह अब सीढ़ियों पर किया जा रहा है। गंगा के दूसरी ओर सिपहिया घाट, रमना घाट, बलुआ घाट, और कैथी घाट जैसे स्थानों पर भी चिताएं जल रही हैं, क्योंकि लोग मणिकर्णिका की स्थिति देखकर इन घाटों की ओर रुख कर रहे हैं।

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