देश में इन दिनों एक ऐसा नाम तेजी से चर्चा में आया है जिसने सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक हलचल बढ़ा दी है. नाम है कॉकरोच जनता पार्टी. पहले लोगों ने इसे मजाक समझा, फिर मीम माना और अब इसे लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है. इंटरनेट पर इसकी रफ्तार ने हर किसी को चौंका दिया है. सबसे ज्यादा चर्चा इसकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता को लेकर हो रही है, जिसने कुछ ही दिनों में लाखों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया.
फॉलोअर्स ने बढ़ाई हलचल
बताया जा रहा है कि लॉन्च के कुछ ही दिनों के भीतर इस मंच ने सोशल मीडिया पर बड़ी मौजूदगी दर्ज कराई. इंस्टाग्राम पर इसके फॉलोअर्स तेजी से बढ़े और इसने कई बड़े राजनीतिक पेजों की तुलना में भी चर्चा बटोर ली. इसी वजह से सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई कि आखिर एक व्यंग आधारित मंच इतनी तेजी से युवाओं तक पहुंचा कैसे. यही सवाल अब लगातार लोगों के बीच उठ रहा है.
शुरुआत कैसे हुई
जानकारी के मुताबिक इस अभियान की शुरुआत 16 मई के आसपास सोशल मीडिया मंच एक्स पर हुई थी. शुरुआत में हल्के व्यंग और मजाकिया पोस्ट किए गए. लेकिन धीरे-धीरे यह युवाओं के बीच चर्चा का विषय बन गया. इसके बाद इंस्टाग्राम पर इसकी मौजूदगी बढ़ी और छोटे वीडियो, मीम और डिजिटल पोस्ट तेजी से वायरल होने लगे. देखते ही देखते यह सिर्फ एक पेज नहीं बल्कि चर्चा का विषय बन गया.
कौन हैं अभिजीत दीपके
इस अभियान के पीछे अभिजीत दीपके का नाम सामने आया. वह महाराष्ट्र के औरंगाबाद यानी छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले पॉलिटिकल कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजिस्ट बताए जाते हैं. उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की और बाद में विदेश में उच्च शिक्षा भी हासिल की. सोशल मीडिया और डिजिटल अभियानों में उनकी पहले से सक्रिय भूमिका बताई जाती रही है.
युवाओं को क्यों जोड़ रहा मंच
बताया जा रहा है कि युवाओं के गुस्से, बेरोजगारी, व्यवस्था को लेकर सवाल और भविष्य की चिंताओं को व्यंग के जरिए सामने लाने की कोशिश की गई. यही वजह रही कि बड़ी संख्या में युवाओं ने खुद को इससे जोड़ना शुरू किया. लोगों को लगा कि कोई मंच उनकी भाषा में बात कर रहा है और उन्हीं के मुद्दों को सामने रख रहा है.
अब बड़ा सवाल क्या
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह कुछ दिनों का सोशल मीडिया ट्रेंड है या फिर युवाओं की सोच का नया डिजिटल रूप. पहले विरोध सड़कों पर दिखता था लेकिन अब मीम और छोटे वीडियो भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. इस पूरे घटनाक्रम ने इतना जरूर दिखाया है कि नई पीढ़ी अपनी बात कहने के लिए नए रास्ते चुन रही है.
