राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य का पालिघाट क्षेत्र इन दिनों वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यहां चार अलग-अलग घोंसलों से करीब 100 घड़ियाल के बच्चे सुरक्षित बाहर निकले हैं। गंभीर रूप से लुप्तप्राय मानी जाने वाली इस प्रजाति के संरक्षण के लिए चल रहे प्रयासों के बीच इसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि यह सफलता आने वाले समय में घड़ियालों की आबादी बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
नवजात बच्चों की सुरक्षा पर विशेष निगरानी
रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के पास स्थित इस अभयारण्य में घड़ियाल के नवजात बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। वन विभाग की टीमें लगातार गश्त कर रही हैं और घोंसले वाले इलाकों पर नजर बनाए हुए हैं। अधिकारियों के अनुसार शुरुआती कुछ सप्ताह घड़ियाल के बच्चों के लिए बेहद संवेदनशील होते हैं। ऐसे में किसी भी तरह की लापरवाही उनके जीवन के लिए खतरा बन सकती है। यही कारण है कि संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है।
500 से अधिक अंडों से शुरू हुई थी प्रक्रिया
वन विभाग के मुताबिक अप्रैल महीने में पालिघाट और आसपास के रेतीले किनारों पर बने 22 से 25 घोंसलों में घड़ियालों ने लगभग 500 से 600 अंडे दिए थे। घड़ियाल के अंडों से बच्चे निकलने में करीब दो महीने का समय लगता है। मई के अंतिम सप्ताह में अंडों से बच्चे निकलने की प्रक्रिया शुरू हुई। विभाग का अनुमान है कि आने वाले दिनों में अन्य घोंसलों से भी बड़ी संख्या में बच्चे बाहर आ सकते हैं।
इंसानी गतिविधियों पर भी लगाया गया नियंत्रण
घोंसलों और नवजात बच्चों की सुरक्षा के लिए वन विभाग ने कई विशेष कदम उठाए हैं। घोंसले वाले क्षेत्रों के आसपास सुरक्षा बाड़ लगाई गई है ताकि जंगली जानवर वहां तक न पहुंच सकें। साथ ही कई संवेदनशील स्थानों पर मानव गतिविधियों को भी सीमित या प्रतिबंधित किया गया है। अधिकारियों ने स्थानीय लोगों और पर्यटकों से अपील की है कि वे नदी किनारों और घोंसलों के आसपास अनावश्यक आवाजाही से बचें।
घड़ियाल संरक्षण को मिलेगी नई मजबूती
वन विभाग ने बताया कि पालिघाट क्षेत्र में 27.25 लाख रुपये की लागत से एक आधुनिक घड़ियाल पालन केंद्र भी विकसित किया जा रहा है। इससे संरक्षण कार्यक्रमों को और मजबूती मिलने की उम्मीद है। वर्तमान में चंबल अभयारण्य में 130 से अधिक वयस्क घड़ियाल मौजूद हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला यह अभयारण्य घड़ियालों के साथ-साथ मगरमच्छ, कछुए, गंगा डॉल्फिन और कई दुर्लभ पक्षी प्रजातियों का भी सुरक्षित आवास माना जाता है।
संरक्षण अभियान के लिए सकारात्मक संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी संख्या में घड़ियाल बच्चों का सुरक्षित बाहर आना संरक्षण प्रयासों की सफलता का संकेत है। यदि इसी तरह सुरक्षा और निगरानी जारी रही तो आने वाले वर्षों में इस दुर्लभ प्रजाति की संख्या में और वृद्धि देखने को मिल सकती है।
