बिहार के भोजपुर जिले में गंगा कटाव से उजड़ चुके जवईनिया गांव के विस्थापित परिवारों ने अपनी नई बस्ती का नाम ‘भरत नगर’ रख दिया है। गांव के प्रवेश द्वार पर भरत भूषण तिवारी के नाम का बोर्ड भी लगाया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ नाम बदलने का फैसला नहीं, बल्कि उस संघर्ष को याद रखने की कोशिश है, जो पुनर्वास और बुनियादी सुविधाओं के लिए लड़ा गया। उनका दावा है कि भरत तिवारी ने विस्थापित परिवारों की आवाज उठाने में अहम भूमिका निभाई थी।
कटाव के बाद शुरू हुआ संघर्ष
पिछले साल गंगा के तेज कटाव में जवईनिया गांव के सैकड़ों घर, खेती और स्कूल नदी में समा गए थे। इसके बाद कई परिवारों को बिलौटी गांव के पास जमीन दी गई, लेकिन लोगों का कहना है कि जमीन निचले इलाके में होने से वहां रहना आसान नहीं था। ग्रामीणों के मुताबिक भरत तिवारी लगातार प्रशासन से मिट्टी भराई, सड़क, बिजली, पानी और बेहतर पुनर्वास की मांग करते रहे। उनका कहना था कि यह जिम्मेदारी सरकार की है और प्रभावित परिवारों को पूरी सुविधा मिलनी चाहिए।
एनकाउंटर पर अब भी उठ रहे सवाल
17 जून को पुलिस एनकाउंटर में भरत भूषण तिवारी की मौत हो गई। पुलिस ने घटना को मुठभेड़ बताया है, जबकि कई ग्रामीणों का दावा है कि घटनाक्रम अलग था। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने आरोप लगाया कि तिवारी ने बाद में हथियार छोड़ दिया था, जबकि पुलिस का पक्ष इससे अलग है। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और पूरे मामले की जांच अभी जारी है। इसी वजह से घटना को लेकर कई सवाल अब भी बने हुए हैं।
भरत नगर अब संघर्ष की पहचान
ग्रामीणों ने ऐलान किया है कि गांव में आगे चलकर भरत तिवारी की प्रतिमा भी लगाई जाएगी। उनका कहना है कि सबसे पहले मिट्टी भराई, सड़क, जल निकासी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए लड़ाई जारी रहेगी। फिलहाल ‘भरत नगर’ उन विस्थापित परिवारों के लिए सिर्फ एक नया गांव नहीं, बल्कि अपने उजड़े घर, अधूरे पुनर्वास और लंबे संघर्ष की पहचान बन गया है।
