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अफगानिस्तान–पाकिस्तान तनाव किस दिशा में है ?

अफगानिस्तान–पाकिस्तान तनाव किस दिशा में है ?

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते कभी सहज नहीं रहे, लेकिन तालिबान की वापसी के बाद दोनों देशों के बीच तनाव एक नए और अधिक खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुका है। कभी रणनीतिक साझेदार रहे ये दोनों देश आज सीमा सुरक्षा, आतंकवाद, शरणार्थी संकट और राजनीतिक अविश्वास के जटिल जाल में उलझे हुए हैं। सवाल यह है कि यह तनाव किस दिशा में जाएगा — संवाद, संघर्ष या स्थायी अस्थिरता की ओर? अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच विवाद की सबसे पुरानी और गहरी जड़ है ड्यूरंड रेखा। यह सीमा रेखा ब्रिटिश काल में खींची गई थी, जिसे अफगानिस्तान आज भी औपचारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में पूरी तरह स्वीकार नहीं करता।

इस रेखा के दोनों ओर बसे पश्तून समुदाय के लिए यह सीमा कृत्रिम है। यही वजह है कि सीमा पार आवाजाही, तस्करी और उग्रवाद लंबे समय से यहां समस्या बने हुए हैं।तालिबान सरकार इस रेखा पर पाकिस्तान की बाड़बंदी का विरोध करती रही है, जिससे सीमा पर झड़पें लगातार होती रहती हैं। तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता बना है तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP)। पाकिस्तान का आरोप है कि TTP को अफगानिस्तान में सुरक्षित पनाह मिल रही है, जहां से वह पाकिस्तानी सेना और पुलिस पर हमले करता है। इन हमलों में पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों सुरक्षाकर्मी और नागरिक मारे जा चुके हैं। तालिबान सरकार इन आरोपों को खारिज करती है और कहती है कि अफगान भूमि का इस्तेमाल किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा, लेकिन जमीनी हालात पाकिस्तान को आश्वस्त नहीं कर पाए हैं।

सैन्य टकराव और सीमा झड़पें: बढ़ता हुआ तनाव

पिछले कुछ समय में दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीमित सैन्य झड़पें हुई हैं। पाकिस्तान द्वारा अफगान सीमा क्षेत्र में किए गए हवाई हमलों और जवाबी फायरिंग ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है। हालांकि अभी तक कोई पूर्ण युद्ध जैसी स्थिति नहीं बनी है, लेकिन लगातार बढ़ती झड़पें किसी बड़े टकराव की चेतावनी जरूर देती हैं। पाकिस्तान में दशकों से रह रहे अफगान शरणार्थियों का मुद्दा भी रिश्तों में कड़वाहट घोल रहा है।पाक सरकार ने हाल के वर्षों में लाखों अफगान शरणार्थियों को वापस भेजने का अभियान तेज किया है। पाकिस्तान का तर्क है कि सुरक्षा खतरे और आर्थिक बोझ के चलते यह कदम जरूरी है, जबकि तालिबान सरकार इसे मानवीय संकट और जबरन निष्कासन करार देती है। इससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव और गहरा गया है। अफगानिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ने से व्यापार मार्ग बाधित होते हैं, जिससे अफगान अर्थव्यवस्था पर और दबाव पड़ता है। वहीं पाकिस्तान खुद आर्थिक अस्थिरता से गुजर रहा है, ऐसे में सीमा अस्थिरता उसके लिए भी नुकसानदेह है।

चीन, रूस, ईरान और अमेरिका जैसे देश इस तनाव को ध्यान से देख रहे हैं। चीन खासतौर पर इसलिए चिंतित है क्योंकि CPEC और बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा इस क्षेत्र की स्थिरता पर निर्भर करती है।कोई भी बड़ा टकराव पूरे दक्षिण एशिया और मध्य एशिया को अस्थिरता की आग में झोंक सकता है।वर्तमान संकेत बताते हैं कि यह तनाव पूर्ण युद्ध की ओर नहीं जाएगा, लेकिन निम्न स्तर का लगातार संघर्ष बना रह सकता है।

इसके तीन संभावित रास्ते हैं:

छोटी-छोटी झड़पें, हवाई हमले और सीमा फायरिंग होती रहेगी, जिससे तनाव स्थायी बना रहेगा।अंतरराष्ट्रीय दबाव और आर्थिक मजबूरी दोनों देशों को बातचीत की मेज पर ला सकती है।यदि TTP और अन्य आतंकी गुट और सक्रिय हुए तो हालात पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकते हैं।अफगानिस्तान और पाकिस्तान इस समय अस्थिर शांति (Fragile Peace) के दौर से गुजर रहे हैं। युद्ध से दोनों को नुकसान है, लेकिन अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि रिश्तों में सहजता लौटना आसान नहीं।

यह टकराव अब केवल सीमा विवाद नहीं, बल्कि आतंकवाद, पहचान, राजनीति और क्षेत्रीय वर्चस्व की जटिल लड़ाई बन चुका है।आने वाले महीनों में यही तय होगा कि यह क्षेत्र संवाद के रास्ते स्थिरता की ओर बढ़ेगा या संघर्ष के दलदल में और गहराएगा।

Ankit Awasthi

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