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प्रयागराज का एक ऐसा मंदिर, जहां मिलती है काल सर्प दोष से मुक्ति

प्रयागराज का एक ऐसा मंदिर, जहां मिलती है काल सर्प दोष से मुक्ति

प्रयागराज जिसे तीर्थराज के नाम से भी जाना जाता है, उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक शहर है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के पवित्र संगम तट पर बसा यह शहर आध्यात्मिकता और श्रद्धा का केंद्र है। इसी शहर के दारागंज क्षेत्र में गंगा नदी के किनारे स्थित है नागवासुकी मंदिर, जो हिंदू धर्म में सर्पों के राजा वासुकी को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर न केवल अपनी पौराणिक कथाओं और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसके साथ जुड़े रहस्य और चमत्कार भी इसे विशेष बनाते हैं।

नागवासुकी मंदिर की कथा हिंदू पुराणों, विशेष रूप से पद्म पुराण, स्कंद पुराण, भागवत पुराण और महाभारत से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, नागवासुकी, जो सर्पों के राजा हैं, जिन्होने समुद्र मंथन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। समुद्र मंथन में देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया था। इस प्रक्रिया में वासुकी को भारी घर्षण का सामना करना पड़ा, जिससे उनका शरीर लहूलुहान हो गया और उन्हें गहरी चोटें आईं।

भगवान विष्णु ने वासुकी को सलाह दी कि वे प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में स्नान करें और विश्राम करें, जहां पवित्र जल उनकी चोटों को ठीक करेगा। वासुकी ने ऐसा ही किया और त्रिवेणी संगम के जल से उनकी पीड़ा समाप्त हो गई। इसके बाद, वासुकी ने प्रयागराज को अपना स्थायी निवास बना लिया। उन्होंने भगवान विष्णु से वचन मांगा कि सावन मास की नाग पंचमी को तीनों लोकों में उनकी पूजा की जाए। यह मंदिर उसी पौराणिक घटना का प्रतीक है, और यह माना जाता है कि यहां दर्शन करने से कालसर्प दोष और अन्य सर्प बाधाओं से मुक्ति मिलती है। एक अन्य कथा के अनुसार, जब गंगा आकाश से पृथ्वी पर अवतरित हुईं, तो उनके तेज बहाव के कारण पानी पाताल तक पहुंच गया और वासुकी के फन पर पड़ने से भोगतीर्थ बना। इस तीर्थ के कारण ही मंदिर का पश्चिमी हिस्सा भोगतीर्थ के रूप में जाना जाता है।

नागवासुकी मंदिर की स्थापना 10वीं शताब्दी में मानी जाती है, हालांकि वर्तमान संरचना 18वीं शताब्दी में मराठा राजा श्रीधर भोंसले द्वारा बनवाई गई थी। मंदिर का निर्माण वेसर शैली में हुआ है, जो प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर के गर्भगृह में वासुकी नाग और शेषनाग की मूर्तियां स्थापित हैं, साथ ही भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश और भीष्म पितामह की शयन मुद्रा में एक विशाल प्रतिमा भी मौजूद है। मंदिर के मुख्य द्वार पर शंख बजाते हुए दो कीचक और लक्ष्मी के प्रतीक कमल के साथ दो हाथियों की आकर्षक नक्काशी है, जो इसकी कलात्मकता को और बढ़ाती है। मंदिर का स्थान गंगा नदी के तट पर होने के कारण इसे और भी पवित्र माना जाता है। यह मंदिर प्रयागराज की पंचकोसी परिक्रमा का हिस्सा है, और कुंभ, अर्धकुंभ, माघ मेला और नाग पंचमी के अवसर पर यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर परिसर में अष्टमाधव (प्रयागराज के बारह माधवों में से आठवां) का एक छोटा मंदिर भी है, जिसे हाल के कुंभ मेले के दौरान बनवाया गया था।

प्रयागराज मे बसा नागवासुकी मंदिर के साथ कई रहस्यमयी कहानियां जुड़ी हैं, जो इसे और भी आकर्षक बनाती हैं: बताया जाता है की मुगल सम्राट औरंगजेब, जो मंदिरों को तोड़ने के लिए कुख्यात था, वह नागवासुकी मंदिर को नष्ट करने आया था। जब उसने वासुकी की मूर्ति पर तलवार या भाला चलाया, तो मूर्ति से दूध की धार निकली और औरंगजेब के चेहरे पर पड़ी, जिससे वह डरकर बेहोश हो गया। इस चमत्कार के बाद वह मंदिर को नष्ट किए बिना वापस लौट गया। यह घटना मंदिर की अलौकिक शक्ति का प्रतीक मानी जाती है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, मंदिर के परिसर से कंकड़ ले जाकर घर के चारों ओर रखने से सांपों और सर्पदोष की छाया से मुक्ति मिलती है। यह विश्वास आज भी श्रद्धालुओं में प्रचलित है। मंदिर में कालसर्प दोष निवारण के लिए विशेष पूजा और हवन आयोजित किए जाते हैं। मान्यता है कि यहां विधि-विधान से पूजा करने पर कालसर्प दोष और अन्य सर्प बाधाएं हमेशा के लिए समाप्त हो जाती हैं। नाग पंचमी के दिन विशेष रूप से दूध चढ़ाने और रुद्राभिषेक करने की परंपरा है, जिससे भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मंदिर को वासुकी की कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो आध्यात्मिक चेतना और जीवन ऊर्जा को जागृत करती है। यह विश्वास मंदिर को आध्यात्मिकता का एक प्रमुख केंद्र बनाता है।

नागवासुकी मंदिर का धार्मिक महत्व अत्यधिक है, मान्यता है कि त्रिवेणी संगम में स्नान करने के बाद नागवासुकी मंदिर के दर्शन किए बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है। कुंभ और अर्धकुंभ के दौरान यह मंदिर तीर्थयात्रियों के लिए अनिवार्य पड़ाव है। सावन मास और नाग पंचमी के अवसर पर मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। इस दौरान विशेष पूजा, हवन और रुद्राभिषेक आयोजित किए जाते हैं। मंदिर में पूजा करने से कालसर्प दोष, सर्प बाधा और अन्य ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है। यह मंदिर उन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिनकी कुंडली में सर्पदोष हो। वासुकी को भगवान शिव के गले का हार और विष्णु का प्रिय माना जाता है। इसलिए, यह मंदिर शिव और विष्णु भक्तों के लिए भी पवित्र है।

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