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बंदरगाहों पर अटका बासमती, मध्यप्रदेश के व्यापारियों की बढ़ी चिंता

बंदरगाहों पर अटका बासमती, मध्यप्रदेश के व्यापारियों की बढ़ी चिंता

मध्य प्रदेश का बासमती चावल कारोबार इन दिनों वैश्विक हालात की मार झेल रहा है. पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध जैसे तनाव ने प्रदेश के निर्यात कारोबार को सीधे प्रभावित किया है. हालात यह हैं कि करीब 4 लाख टन बासमती चावल बंदरगाहों और गोदामों में फंसा हुआ है, जबकि निर्यात की रफ्तार लगभग थम गई है. इसका असर सिर्फ व्यापारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने लगा है.

दरअसल, मध्य प्रदेश के रायसेन और नर्मदापुरम जिले बासमती चावल के बड़े उत्पादक माने जाते हैं. यहां से बड़ी मात्रा में चावल खाड़ी देशों — खासकर सऊदी अरब, यूएई और कुवैत — को भेजा जाता है. सामान्य परिस्थितियों में इन जिलों से प्रतिदिन करीब 20 टन बासमती चावल का निर्यात होता है. लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण समुद्री मार्ग प्रभावित हुए हैं. कई जहाजों की आवाजाही सीमित हो गई है, जबकि कुछ शिपमेंट बंदरगाहों पर ही रोक दिए गए हैं.

इस स्थिति का सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि चावल का तैयार माल मिलों और गोदामों में जमा होता जा रहा है. व्यापारी फिलहाल नया माल खरीदने से बच रहे हैं, क्योंकि पुराना स्टॉक ही बाहर नहीं जा पा रहा है. नतीजतन बाजार में आपूर्ति बढ़ने लगी है और कीमतों पर दबाव दिखाई दे रहा है.

व्यापारियों के अनुसार, युद्ध के कारण शिपिंग कंपनियों ने प्रति कंटेनर 2000 से 2500 डॉलर तक का “वॉर टैरिफ” लगा दिया है. इससे निर्यात की लागत अचानक काफी बढ़ गई है. रायसेन के चावल मिल मालिक सचिन वर्मा का कहना है कि समुद्री मार्गों में अस्थिरता के कारण शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त शुल्क वसूल रही हैं, जिससे निर्यातकों के लिए कारोबार करना मुश्किल हो गया है.

वहीं चावल व्यापारी प्रांजल मालानी बताते हैं कि प्रदेश का करीब 4 लाख टन बासमती चावल बंदरगाहों और गोदामों में अटका हुआ है. उनका कहना है कि जब पुराना माल ही नहीं निकल पा रहा, तो नए सौदे होना भी मुश्किल हो गया है. इसका असर बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है और बासमती चावल की कीमतों में 7 से 10 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की जा चुकी है.

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए निर्यातकों ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है. उन्होंने एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (APEDA) से आग्रह किया है कि वह इस मामले को केंद्र सरकार और वाणिज्य मंत्रालय के सामने तुरंत उठाए. इंडियन राइस एक्सपोर्ट फेडरेशन के महानिदेशक विनोद कुमार कौल के अनुसार, इस समय निर्यातकों को कंटेनरों की भारी कमी, जहाजों की रद्द यात्राएं और बढ़ती लॉजिस्टिक लागत जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है. उनका कहना है कि युद्ध जैसी स्थितियों का असर वैश्विक व्यापार पर पड़ना स्वाभाविक है और स्थिरता के लिए जल्द शांति जरूरी है.

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो मध्य प्रदेश का बासमती कारोबार और अधिक दबाव में आ सकता है. निर्यात में आई यह रुकावट न केवल व्यापारियों की कमाई घटा रही है, बल्कि किसानों के सामने भी नई अनिश्चितता खड़ी कर रही है. ऐसे में व्यापार जगत की नजर अब सरकार के संभावित कदमों पर टिकी हुई है, जिससे इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता मिल सके.

Ankit Awasthi

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