कानपुर, राजबीर सिंह।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हों या फिर पूर्व मुख्यमंत्री सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव, दोनों ने बिहार में यूं ही पूरा जोर नहीं लगाया, दरअसल उप्र के रीजनिति की खिड़की बिहार से ही खुलती है। बिहार से जुड़ी 8 लोकसभा और करीब 50 विधानसभा सीटें बिहार की जीत-हार से प्रभावित होती हैं। शायद इसीलिए सपा का कोई प्रत्याशी भले बिहार में चुनाव न लड़ रहा हो लेकिन अखिलेश ने 8 दिनों में 23 रैलियां कर डालीं।
सीएम योगी ने खुद 25 से ज्यादा रैलियां करने के साथ अपने कई मंत्रिय़ों, विधायकों के साथ प्रदेश के सांसदों को बिहार चुनाव में झोंका। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को तो सह चुनाव प्रभारी बनाकर बिहार भेजा गया। इसी तरह अखिलेश यादव अपनी सांसद इकरा हसन, अयोध्या से सपा सांसद अवधेश प्रसाद के अलावा कई विधायकों और सांसदों को बिहार ले गए और सभी ने वहां महागठबंधन खासकर आरजेडी के लिए सक्रिय भूमिका निभायी।
दोनों नेताओं को 2027 का विधानसभा चुनाव दिख रहा है, जो तल्खी दोनों नेताओं में उप्र में देखने को मिलती है वही हमले दोनों ने बिहार में एक-दूसरे पर किए। कई बार तो लगा ये रैलियां जैसे उप्र में हो रही हों। योगी ने तो उप्र के ही उदाहरण हर रैली में दिए तो अखिलेश ने उप्र को बर्बाद करने और सांप्रदायिकता के आरोप योगी पर मढ़े। माना जाता है कि सीमा पर पड़ने वाली विधानसभा सीटों पर बिहार का सीधा असर पड़ता है क्योंकि यहां के लोगों की बिहार के लोगों से बेटी-रोटी का रिश्ता है और इन परिवारों पर एक-दूसरे प्रदेश की राजनीति का उसी तरह प्रभाव भी देखा जाता है।



