न्यूज प्लस डेस्क, लखनऊ। लड़खड़ाती बसपा को मायावती क्या एक बार फिर ब्राह्मणों के दम पर खड़ा कर पाएंगी या ब्राह्मण कार्ड से किसी का खेल बिगाड़ेंगी। बसपा सुप्रीमो मायावती को पता है कि ब्राह्मण वर्तमान में अपना ठिकाना खोज रहा है, इसलिए वह इस वोट बैंक को फिर से अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। एक बार सोशल इंजीनियरिंग के दम पर सरकार बना चुकी हैं।
वैसे तो ब्राह्मण आमतौर पर भाजपा के साथ रहते हैं लेकिन कुछ सालों से भाजपा से उसक नाराजगी देखी जा रही है। उप्र में भाजपा के अंदर ब्राह्णण बनाम ठाकुर साफ दिख रहा है। इसके साथ कुछ ऐसे घटनाक्रम सामने आए जिससे ब्राह्मणों की भाजपा से नाराजगी दिखी। विकास दुबे का एंकाउंटर, खुशी दुबे के साथ पुलिस कार्रवाई से ब्राह्मण नाराज हुआ। कानपुर देहात में मंत्री प्रतिभा शुक्ला बनाम एमपी देवेंद्रे सिंह भोले प्रकरण में मंत्री को धरने पर बैठना पड़ा और उनके पति को डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक से यहां तक कहना पड़ा कि आखिर वह ब्राह्मण उनको क्यों वोट देंगे। ताजा घटनाक्रम में ब्राह्मण विधायकों की बैठक को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने जातीय राजनीति बता चेतावनी देना भी ब्राह्मणों को नागवार गुजरा। इसके बाद शहर-शहर ब्राह्मणों ने बाटी-चोखा और खिचड़ी भोज शुरू किए। सपा के साथ ब्राह्मण कभी नहीं आया, कुछ चुनिंदा नेताओं और उनके साथ जुड़े वोटरों के के अलावा ब्राह्मण कभी पूरी तरह सपा के साथ नहीं आया, बल्कि कहें तो ब्राह्मण की सपा से दूरी ही रही है।
इन समीकरणों को देख कर मायावती ने अपने जन्मदिन पर खासकर ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश की, और वह इसलिए भी क्योंकि वह इस समीकरण से एक बार सरकार बना चुकी हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो अब दोबारा ब्राह्मण उस तरह पूरी तरह बसपा के साथ तो नहीं आएगा लेकिन अगर मायावती इस रणनीति पर काम करती हैं तो भाजपा से नाराज ब्राह्मण जरूर उनके साथ आ सकता है और अगर ऐसा हुई तो भाजपा को नुकसान हो सकता है, जिसका फायदा सपा को मिल सकता है।



