न्यूजप्लस डेस्क। नरेन्द्र मोदी के धुरविरोधी यशवंत सिन्हा कांग्रेस युवराज राहुल गांधी से आहत हैं। राहुल ने जिस तरह से भारतीय सेना को जातिगत बहस में घसीटा है , उसने यह साफ कर दिया है कि आरक्षण को लेकर देश में जातिगत दूरियां बढ़तीं जा रही हैं। वोट बैंक के लिए आरक्षण पर नेताओं का लगातार गुणगान वास्तव में एक ऐसी लकीर खींच रहा है, जो सामाजिक तानेबाने को घाव देता जा रहा है।
यशवंत सिन्हा ने भले ही भारतीय सेना की एकमात्र की जाति देशभक्ति, साहस और बलिदान बताया है लेकिन राहुल की टिप्पणी यह बता रही है कि सत्ता का उनसे, दूर जाना उन्हें दर्द ही नहीं दे रहा है, अवचेतन मन को भी टीस दे रहा है। आरक्षण से इतर जातिगत व्यवस्था बनाने के लिए हर समय सवर्णों को ताने और कोसा जा रहा है पर क्या हकीकत से कोई वाकिफ है? क्यों नहीं संविधान निर्माताओं की बातों का पालन किया जा रहा है? आरक्षण व्यवस्था लागू करने के लिए दस साल बाद यानी 70 साल के बाद भी समीक्षा नहीं की जा रही है? क्यों नहीं एक बार आरक्षण का लाभ लेने के बाद ब्रेक करने का प्रावधान किया जा रहा है? क्यों नहीं सरसब्ज परिवारों को आरक्षण का लाभ देने पर रोक लगाई जा रही है? क्या पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण दिया जाता रहेगा? सवर्ण , 99 नंबर लाएगा तब भी सेलेक्ट नहीं होगा लेकिन आरक्षण वर्ग चाहे जितने नंबर लाए यानी 30 नंबर भी लाए तबभी सेलेक्ट होगा? यह कैसी व्यवस्था है? क्या इस तरह हम 2047 में विकसित भारत बना पाएंगे? इसलिए अब यह सबके सोचने की व्यवस्था है। समय आ गया है कि आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की जानी चाहिए और क्रीमीलेयर की सीमा 5 लाख कर उससे ऊपर के लोगों को आरक्षण क्यों मिले , इस पर सोचना होगा अन्यथा देश की प्रतिभा बार-बार कुचली जाएगी तो वह कब बगावत कर देगी , कोई नहीं जानता है। रही बात राहुल गांधी की तो उन्होंने सेना को जातिगत खेल में डाल दिया है तो आरक्षण नियम क्यों नहीं वहां लागू कर दिए जाने चाहिए? यह प्रयोग कर देखा जाए, सीमाएं हाशिए पर जाएं तो नेताओं की बला से !



