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सपा, बीजेपी, कांग्रेस सब सक्रिय, दलित वोटबैंक में सेंध से बढ़ी चिंता, 2027 से पहले क्या बच पाएगा बसपा का आधार ?

सपा, बीजेपी, कांग्रेस सब सक्रिय, दलित वोटबैंक में सेंध से बढ़ी चिंता, 2027 से पहले क्या बच पाएगा बसपा का आधार ?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 22 फीसदी दलित वोटबैंक इस समय सबसे अहम बन गया है। इसी के सहारे बसपा ने सालों तक सत्ता देखी, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। सपा, बीजेपी और कांग्रेस समेत कई दल इस वोटबैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटे हैं, जिससे मुकाबला और कड़ा हो गया है।

बसपा का घटता जनाधार चिंता की वजह
मायावती की पार्टी बसपा लगातार कमजोर होती दिख रही है। चुनाव दर चुनाव उसका वोट प्रतिशत कम होता जा रहा है और कई बड़े नेता भी पार्टी छोड़ चुके हैं। हालात यह हैं कि विधानसभा और लोकसभा दोनों में पार्टी का प्रदर्शन काफी खराब रहा, जिससे पार्टी के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है।

2007 की सफलता अब दूर की बात
एक समय ऐसा था जब बसपा ने 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। उस समय दलितों के साथ अन्य वर्गों को जोड़ने की रणनीति सफल रही थी। लेकिन अब वही समीकरण टूटते नजर आ रहे हैं। धीरे-धीरे पार्टी का वोट शेयर गिरकर काफी नीचे पहुंच चुका है।

नए नेताओं से बढ़ी चुनौती
दलित राजनीति में अब नए चेहरे भी उभरकर सामने आ रहे हैं। खासकर जाटव समाज में नए नेताओं की सक्रियता ने बसपा के पारंपरिक वोटबैंक में सेंध लगानी शुरू कर दी है। गैर-जाटव दलित पहले ही पार्टी से दूर हो चुके हैं, जिससे मायावती के लिए चुनौती और बढ़ गई है।

विपक्षी दलों की बढ़ती सक्रियता
कांग्रेस, सपा और बीजेपी सभी दलित समुदाय को साधने में जुटे हैं। कोई कांशीराम के नाम पर राजनीति कर रहा है तो कोई योजनाओं के जरिए समर्थन जुटा रहा है। इससे बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पुराने वोटरों को वापस जोड़ने की है।

2027 चुनाव से पहले बड़ी परीक्षा
आने वाले विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने वोटबैंक को कैसे बचाए रखें। अगर यही स्थिति बनी रही तो चुनावी राह और मुश्किल हो सकती है। अब देखना होगा कि बदलते राजनीतिक माहौल में बसपा किस तरह खुद को संभालती है।

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