योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में उत्तर प्रदेश सरकार ने 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा सियासी कदम उठाया है। कैबिनेट ने डॉ. भीमराव अंबेडकर मूर्ति विकास योजना को मंजूरी दे दी है। इस योजना के तहत प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर अंबेडकर समेत अन्य महापुरुषों, समाज सुधारकों और सांस्कृतिक विभूतियों के स्मारकों का संरक्षण और सौंदर्यीकरण किया जाएगा। हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 10 स्मारकों का कायाकल्प किया जाएगा, जिससे सरकार दलित समाज को सीधा संदेश देना चाहती है कि वह उनके सम्मान और पहचान के लिए काम कर रही है।
सरकार का दावा और विपक्ष का हमला
डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने कहा कि जिन जगहों पर अंबेडकर की प्रतिमाओं पर छत्र नहीं है, वहां उनका नवीनीकरण कर व्यवस्थित रूप दिया जाएगा और इसकी शुरुआत 14 अप्रैल से होगी। वहीं विपक्ष ने इस पर तीखा हमला बोला है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह सिर्फ दिखावा है, जबकि असल मुद्दा आरक्षण और अधिकारों का है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार दलितों के अधिकारों को कमजोर कर रही है और अब प्रतीकों के जरिए राजनीति कर रही है।
रणनीति या जोखिम भरा दांव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला भाजपा की दलित आउटरीच रणनीति का हिस्सा है। वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह भी दलित हितों की पक्षधर है। लेकिन इसे दुधारी तलवार भी माना जा रहा है, क्योंकि इससे अपेक्षित लाभ मिलना तय नहीं है। अगर यह कदम लोगों को प्रभावित करता है तो भाजपा को फायदा मिल सकता है, लेकिन अगर इसे सिर्फ प्रतीकात्मक राजनीति माना गया तो उल्टा असर भी पड़ सकता है।
वोट बैंक की गणित समझिए
उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 20.7 प्रतिशत है, जो चुनावी नतीजों में बड़ा असर डालती है। इसमें जाटव, पासी, कोरी, धोबी, खटिक और बाल्मिकी जैसी प्रमुख जातियां शामिल हैं। जाटव समुदाय को बसपा का मजबूत आधार माना जाता है, जबकि गैर-जाटव दलित वोटों में बिखराव ज्यादा है। भाजपा ने 2011 से 2022 तक गैर-जाटव वोटों को साधकर अपना आधार मजबूत किया था, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में उसे करीब 8.5 प्रतिशत वोट का नुकसान हुआ, जिससे नई रणनीति की जरूरत महसूस हुई।
2027 की सियासी दिशा तय करेगी योजना
भाजपा इस योजना को बड़े राजनीतिक निवेश के रूप में देख रही है। पहले भी अंबेडकर जयंती पर विशेष अभियान चलाकर दलित बस्तियों में संपर्क साधा गया था, अब उसी प्रयास को सरकारी स्तर पर मजबूत किया जा रहा है। पार्टी नेताओं का दावा है कि यह महापुरुषों के सम्मान का काम है, जबकि विपक्ष इसे वोट बैंक की राजनीति बता रहा है। अब असली सवाल यही है कि क्या मूर्तियों का सौंदर्यीकरण वोटों में तब्दील होगा या नहीं। इसका जवाब 2027 के चुनाव नतीजे ही देंगे।
