सावन का महीना 11 जुलाई से शुरू हो चुका है और आज सावन का पहला सोमवार है, भगवान शिव के लिए ये विशेष महीना माना जाता है. इस पूरे महीने भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने भक्त पूजा-आराधना मे लगे रहते है, इन दिनों काशी से लेकर उज्जैन तक भक्तों का जनसैलाब उमड़ा है तो ऐसे मे आज हम आपको बताएंगे उज्जैन के भगवान शिव से जुड़े महाकालेश्वर मंदिर के बारे में और इससे जुड़े अनजाने रहस्य के बारे में, जिसके बारे में शायद ही कोई जानता हो। ये एक ऐसा मंदिर है जहां दर्शन करना लोग सौभाग्य मानते हैं।
भारत के मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर शुक्र जी के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है. पौराणिक ग्रंथों में इस मंदिर का वर्णन काफी सुंदरता से किया गया है. यहां भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग का श्रृंगार भस्म और भांग से किया जाता है. यहां होने वाली भस्म आरती पूरे विश्व में प्रसिद्ध है और इसे महाकाल इसलिए कहा जाता है क्योंकि प्राचीन समय में यही से संपूर्ण विश्व का मानक समय निर्धारित होता था जिस वजह से ज्योतिर्लिंग का नाम महाकालेश्वर रखा गया है.
अगर बात करें महाकालेश्वर मंदिर के इतिहास की तो पुराणों के अनुसार अवंतिका नगरी अर्थात् उज्जैन भगवान शिव को अतिप्रिय था। एक समय अवंतिका नगरी में एक ब्राह्मण रहता था जिसके चार पुत्र थे वहां पर दूषण नामक राक्षस ने आतंक मचा रखा था. वह राक्षस नगर के सभी निवासियों को पीड़ा देने लगा. उस राक्षस के आतंक से बचने के लिए उस ब्राह्मण ने शिव की पूजा-अर्चना शुरू की. ब्राह्मण की तपस्या से खुश होकर भगवान धरती चीरकर यहां प्रकट हुए और राक्षस का वध करके नगर की रक्षा की. इसके बाद सभी श्रद्धालुओं ने भोलेनाथ से उसी स्थान पर हमेशा रहने की. भक्तों की प्रार्थना सुनकर भगवान महाकाल ज्योतिर्लिंग के रूप में अवंतिका में स्थापित हो गए. तब से यह माना जाता है कि जो भी यहां होने वाली आरती में शामिल होता है उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. बिना आरती में शामिल हुए दर्शन पूरे नहीं माने जाते हैं।
आपको बता दें, यहां प्रतिदिन सुबह महाकाल की भस्म आरती होती है और उसके बाद उनका श्रृंगार किया जाता है. कई वर्षों पहले भगवान के श्रृंगार के लिए शमशान से भस्म लाने की परंपरा थी लेकिन अब कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, अमलतास, बड़ और बेर की लकड़ियों को जलाकर तैयार भस्म को कपड़े से छानने के बाद श्रृंगार में उपयोग शुरू हो चुका है। दरअसल भस्म को सृष्टि का आधार माना जाता है इसलिए प्रभु हमेशा इसे धारण किए रहते हैं. इतना ही नहीं यहां पर महिलाओं को आरती देखना मना है। इसके साथ ही आरती करते समय पुजारी को मात्र एक धोती धारण करनी पड़ती है अन्य किसी वस्त्र को धारण करने की मनाही है. भगवान शिव को शमशान का साधक माना जाता है, इस कारण भस्म को उनका श्रंगार आभूषण माना जाता है और ज्योतिर्लिंग पर चढ़े भस्म को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से बीमारियां नहीं होती है.
महाकाल ज्योतिर्लिंग मंदिर में आरती के लिए बुकिंग ऑनलाइन होती है क्योंकि बिना ऑनलाइन बुकिंग के वक्त आरती में शामिल नहीं हो सकते हैं. महाकाल मंदिर में दर्शन करने के बाद जूना महाकाल का दर्शन करना आवश्यक है तभी महाकाल का दर्शन पूर्ण माना जाता है. इस ज्योतिर्लिंग को तीन खंडों में बांटा गया है. निचले खंड में महाकालेश्वर मंदिर, मध्य में ओंकारेश्वर मंदिर और ऊपरी सदन में श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर स्थित है. आपको बता दें, उज्जैन नगरी का एक ही राजा है और वह भी महाकाल बाबा हैं। ऐसा कहा जाता है कि विक्रमादित्य के शासन के बाद से यहां किसी भी राजा का शासन नहीं रहा और यहां कोई भी राजा रात में रुक नहीं सकता. क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि किसी बड़े पद पर पदस्थ मनुष्य यहां रात में नहीं रुक सकते। जिसने भी रुकने की कोशिश की है उसे परेशानियों को सामना करना पड़ा है.



