अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर (करीब 84 लाख रुपये) की नई फीस लगाने के ऐलान ने ग्लोबल टेक इंडस्ट्री में हड़कंप मचा दिया है। लेकिन इसी बीच, चीन ने जवाबी कार्रवाई में 'K-वीजा' नामक नया वीजा प्रोग्राम लॉन्च करने की घोषणा की है, जो खासतौर पर युवा विदेशी साइंस एंड टेक्नोलॉजी टैलेंट को आकर्षित करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह कदम US-China के बीच टैलेंट वॉर को और तेज कर सकता है, खासकर भारत जैसे देशों के प्रोफेशनल्स के लिए।
ट्रंप प्रशासन ने शुक्रवार को घोषणा की कि H-1B वीजा के लिए नियोक्ताओं को प्रति वर्कर सालाना 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क देना होगा। यह फीस नई अप्लिकेशन्स पर लागू होगी, लेकिन मौजूदा होल्डर्स को राहत दी गई है। व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि यह बदलाव अमेरिकी वर्कर्स को प्राथमिकता देने और विदेशी टैलेंट पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से है। हालांकि, यह फैसला टेक जायंट्स जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है, जो हर साल हजारों H-1B वीजा पर निर्भर रहते हैं।
इकोनॉमिस्ट्स का कहना है कि यह फीस US की आर्थिक ग्रोथ को नुकसान पहुंचा सकती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, H-1B वीजा धारकों ने US GDP में 10% से ज्यादा योगदान दिया है। भारत से आने वाले स्किल्ड वर्कर्स सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि 70% से ज्यादा H-1B वीजा भारतीयों को मिलते हैं। सोशल मीडिया पर #H1BVisaFee जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां प्रोफेशनल्स अपनी चिंताएं जता रहे हैं।
चीन का K-वीजा: ग्लोबल टैलेंट के लिए खुला दरवाजा
चीन की यह चाल बिल्कुल समय पर आ गई है। 1 अक्टूबर 2025 से प्रभावी होने वाला K-वीजा युवा विदेशी STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथ्स) प्रोफेशनल्स के लिए है। यह वीजा मल्टी-एंट्री और लॉन्ग-टर्म स्टे की सुविधा देगा, साथ ही वर्क परमिट और फैमिली रीयूनिफिकेशन के विकल्प भी। चाइनीज प्रीमियर ली स्ट्रॉन्ग ने कहा, "हम ग्लोबल टैलेंट को आकर्षित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। K-वीजा चीन को इनोवेशन हब बनाने का एक कदम है।"
K-वीजा की योग्यता में 35 साल से कम उम्र के प्रोफेशनल्स शामिल हैं, जिनके पास टॉप यूनिवर्सिटी से डिग्री या रिलेवेंट एक्सपीरियंस हो। यह H-1B का डायरेक्ट कॉम्पिटिटर लगता है, खासकर तब जब US फीस बढ़ा रहा है। 2025 में चीन ने पहले ही 30% ज्यादा फॉरेन इन्वेस्टमेंट अट्रैक्ट किया है, और यह वीजा उस ट्रेंड को बूस्ट दे सकता है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अगले साल 1 लाख से ज्यादा अप्लिकेशन्स आ सकती हैं।
वीज़ा युद्ध और प्रतिभा पलायन?
अमेरिका ने हाल ही में H-1B वीज़ा फीस बढ़ाकर विदेशी पेशेवरों के लिए रास्ता महँगा कर दिया है। इसके जवाब में चीन ने K-वीज़ा लॉन्च कर तकनीकी प्रतिभा को आकर्षित करने की नई रणनीति अपनाई है। यह कदम वैश्विक स्तर पर “प्रतिभा पलायन” की दिशा बदल सकता है।
अब तक भारत जैसे देशों की उच्च कौशल वाली कार्यबल मुख्यतः अमेरिका की ओर जाती रही है, जिसने सिलिकॉन वैली को गति दी। लेकिन यदि चीन भरोसे और अवसर का माहौल बना सका, तो भारतीय प्रतिभा दो महाशक्तियों में बँट सकती है।
भारत के लिए क्या मतलब?
भारतीय IT सेक्टर, जो H-1B पर 4 लाख करोड़ रुपये का बिजनेस करता है, अब चीन की ओर रुख कर सकता है। TCS, इंफोसिस जैसी कंपनियां पहले से ही शंघाई और बीजिंग में सेटअप बढ़ा रही हैं। लेकिन चुनौतियां भी हैं: चीन की भाषा बैरियर और जियो-पॉलिटिकल टेंशन्स। फिर भी, K-वीजा सस्ता और आसान लग रहा है – कोई फीस नहीं, सिर्फ मेरिट-बेस्ड सिलेक्शन।
| पैरामीटर | H-1B वीजा (US) | K-वीजा (चीन) |
|---|---|---|
| फीस | $100,000 प्रति वर्ष | कोई अतिरिक्त फीस नहीं |
| उम्र लिमिट | कोई नहीं | 35 साल से कम |
| फोकस | स्किल्ड वर्कर्स | युवा STEM टैलेंट |
| स्टार्ट डेट | तुरंत (नई अप्लाई) | 1 अक्टूबर 2025 |
| लॉन्ग-टर्म | 3-6 साल एक्सटेंशन | मल्टी-ईयर स्टे |
आगे क्या? ग्लोबल टैलेंट वॉर की शुरुआत
यह US-China का नया चैप्टर है, जहां वीजा पॉलिसी आर्थिक सुपरपावर बनने का हथियार बन गई है। इंडियन प्रोफेशनल्स के लिए, अब US ड्रीम के अलावा चीन ऑप्शन खुला है। क्या K-वीजा H-1B को पीछे छोड़ देगा?



