जब राजनीति बदलती है तो उसके संकेत फैसलों में दिखते हैं और तमिलनाडु में इस बार कुछ ऐसा ही नजर आ रहा है। यूजीसी विवाद के बीच जहां देश के कई हिस्सों में सवर्ण समाज की चर्चा हो रही है, वहीं इस राज्य में लगभग सभी दलों ने ब्राह्मण उम्मीदवारों से दूरी बना ली है। यह सिर्फ एक चुनावी फैसला नहीं बल्कि बदलते सियासी ट्रेंड का संकेत माना जा रहा है।
द्रविड़ राजनीति का असर बरकरार
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जहां गैर-ब्राह्मण पहचान को प्राथमिकता दी जाती है। इसी वजह से इस बार के चुनाव में किसी भी बड़ी पार्टी ने ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। यहां तक कि भाजपा ने भी कोई ब्राह्मण चेहरा मैदान में नहीं उतारा, जो अपने आप में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
यूजीसी विवाद से अलग रणनीति
अगर इसे यूजीसी विवाद से जोड़कर देखें तो तस्वीर और साफ होती है। देश के कई हिस्सों में इस मुद्दे को लेकर सवर्ण समाज में नाराजगी देखने को मिल रही है, लेकिन तमिलनाडु में पार्टियां इस बहस से दूरी बनाकर स्थानीय मुद्दों पर फोकस कर रही हैं। यहां राष्ट्रीय मुद्दों से ज्यादा क्षेत्रीय सामाजिक समीकरण अहम भूमिका निभा रहे हैं।
इतिहास से जुड़ा है ये बदलाव
तमिलनाडु में ब्राह्मण राजनीति का कम होना कोई नई बात नहीं है। 1950 के दशक से ही यहां गैर-ब्राह्मण राजनीति मजबूत होती गई और ब्राह्मण प्रतिनिधित्व लगातार घटता गया। आज स्थिति यह है कि करीब 3 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद चुनावी राजनीति में उनकी भागीदारी बेहद सीमित हो गई है।
नए दलों ने अपनाई अलग राह
दिलचस्प बात यह है कि जहां मुख्यधारा की पार्टियां दूरी बना रही हैं, वहीं कुछ नए दल ब्राह्मण उम्मीदवारों को मौका देकर अलग रणनीति अपना रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि राजनीति में खाली जगह को भरने की कोशिश भी जारी है। अब सवाल यह है कि यह प्रयोग कितना सफल होता है।
चुनावी गणित का बड़ा खेल
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि तमिलनाडु में चुनाव पूरी तरह जातिगत संतुलन पर आधारित होते हैं। यहां गौंडर, थेवर और मुदलियार जैसे समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं, इसलिए पार्टियां उन्हीं वर्गों को प्राथमिकता देती हैं। फिलहाल ब्राह्मणों से दूरी एक साफ संदेश है कि यहां की राजनीति अभी भी अपने पारंपरिक ढांचे पर ही चल रही है और यही चुनावी रणनीति का आधार बनी हुई है।
