सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) अभियान से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने चुनाव आयोग के उस रुख का समर्थन किया, जिसमें कहा गया था कि आधार कार्ड को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस फैसले ने न केवल बिहार में चल रहे SIR अभियान की वैधता को मजबूती दी, बल्कि आधार कार्ड की कानूनी स्थिति पर भी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए शुरू किया गया SIR अभियान विवादों में रहा है। इस प्रक्रिया के तहत ड्राफ्ट मतदाता सूची से लगभग 65 लाख नाम हटाए जाने की बात सामने आई, जिसने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) सहित कई याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
सुनवाई के दौरान, जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड विभिन्न सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण पहचान दस्तावेज है, लेकिन यह अपने आप में किसी व्यक्ति की नागरिकता स्थापित नहीं करता। उन्होंने कहा, "आधार को नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, इसे सत्यापित करना आवश्यक है।" कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या चुनाव आयोग के पास ऐसी प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार है, और यदि हां, तो यह प्रक्रिया कानून के अनुसार होनी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं के तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया कि SIR प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं। उन्होंने दावा किया कि एक छोटे से निर्वाचन क्षेत्र में 12 जीवित लोगों को गलत तरीके से मृत घोषित किया गया, और बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया। सिब्बल ने यह भी कहा कि 1950 के बाद भारत में जन्मा प्रत्येक व्यक्ति नागरिक है, लेकिन वर्तमान प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि केवल 3.056% लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र और 2.7% के पास पासपोर्ट जैसे दस्तावेज हैं, जिसके कारण कई लोग आवश्यक प्रपत्र जमा नहीं कर पाते।
सिब्बल ने यह भी आरोप लगाया कि 2003 की मतदाता सूची में शामिल लोगों से भी नए प्रपत्र मांगे जा रहे हैं, और ऐसा न करने पर उनके नाम हटाए जा रहे हैं, भले ही उनके निवास में कोई बदलाव न हुआ हो।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि SIR प्रक्रिया एक ड्राफ्ट रोल है, और इसमें कुछ गलतियां स्वाभाविक हैं। उन्होंने कहा कि मृत लोगों को जीवित दिखाने जैसे दावे गलत हैं, और ऐसी गलतियों को सुधारने की प्रक्रिया चल रही है। आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि 7.24 करोड़ लोगों ने आवश्यक प्रपत्र जमा किए थे, लेकिन 65 लाख नाम बिना उचित सत्यापन के हटाए गए।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के रुख को सही ठहराते हुए कहा कि आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण मानने से पहले उसका सत्यापन जरूरी है। जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि यदि बिहार के पास नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज नहीं हैं, तो यह समस्या अन्य राज्यों में भी हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के पास कुछ न कुछ दस्तावेज, जैसे सिम कार्ड खरीदने या ओबीसी/एससी/एसटी प्रमाणपत्र के लिए आवश्यक कागजात, होने चाहिए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि SIR प्रक्रिया कानून के अनुसार है, तो उस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने यह चेतावनी दी कि यदि बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए, तो वह इस मामले में हस्तक्षेप कर सकता है।
इस फैसले ने बिहार में चल रहे SIR अभियान को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। कुछ राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने इसे मतदाताओं के अधिकारों पर हमला बताया, जबकि अन्य ने इसे मतदाता सूची को शुद्ध करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना।



