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....तो क्या उप्र में 2027 में खिलेगा ‘पंकज’

....तो क्या उप्र में 2027 में खिलेगा ‘पंकज’

न्यूज प्लस डेस्क, लखनऊ। पंकज यानी कमल...जी हां अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह नाम वाले पंकज चौधरी क्या 2027 में फिर ‘पंकज’ खिला पाएंगे। क्या उससे पहले वह पंचायत चुनाव में पार्टी को विजय दिला पाएंगे यह बड़ा प्रश्न है। शायद 7 बार के सांसद, वर्तमान में केंद्रीय वित्त मंत्री और कुर्मी जाति से आने वाले राज्यमंत्री पंकज चौधरी पर पार्टी को यह विश्वास है। तभी तो वह उप्र भाजपा के निर्विरोध बनने जा रहे हैं।

पंकज चौधरी के नाम पर मुहर के लिए दिल्ली से लेकर लखनऊ तक बैठकें चलीं। कोई पंकज चौधरी को पीएम मोदी और राजनाथ सिंह का करीबी बता रहा है तो कोई उनको सीएम योगी की पसंद बता रहा है। वह किसकी पसंद हैं यह तो अंदर की बात है लेकिन यह तय है कि 2024 में पिछड़े खासकर कुर्मी वोट छिटकने से लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ा झटका लगा था। सपा ने लोकसभा में 11 कुर्मी नेताओं को टिकट दिया जिसमें से सात की जीत हुई। पूर्वांचल में भाजपा को करारी हार मिली जिसके बाद पार्टी में लगातार पिछड़े वोटों और पूर्वांचल को लेकर मंथन चल रहा था। यही कारण रहा कि उप्र में राकेश सचान, आशीष पटेल और स्वतंत्रदेव सिंह तीन कुर्मी कैबिनेट में शामिल किए गए। पंचायत चुनाव और खासकर विधानसभा चुनाव में कोई चूक न रह जाए इसलिए कुर्मी वोटरों और पूर्वांचल दोनों को साधने के लिए अंततः पंकज चौधरी का नाम आया।

 उप्र के जातीय समीकरण पर नजर डालें तो करीब 18 फीसदी सवर्ण हैं जिसमें करीब 10 फीसदी ब्राह्मण और 5 फीसदी राजपूत हैं। 40-42 फीसदी से ज्यादा पिछड़े और अति पिछड़े वोटर हैं, इसमें 7 फीसदी से ज्यादा कुर्मी और 8 फीसदी के आसपास यादव वोटर हैं। दलित वोटों की संख्या तकरीबन 20-22 फीसदी और मुस्लिम वोटों की संख्या करीब 19 फीसदी है। इस लिहाज से पिछड़े और अति पिछड़े वोटर सबसे अधिक हैं और यही वोटर लोकसभा चुनाव में भाजपा से छिटका था इसलिए बीजेपी में पिछड़े प्रदेश अध्यक्ष को लेकर कशमकश था, अंततः उसी पर मुहर लगी। अब देखना होगा लम्बी राजनीतिक अनुभव वाले पंकज चौधरी उप्र में कितना ‘पंकज’ खिला पाते हैं।

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