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‘नो किंग प्रोटेस्ट’ ने हिलाया अमेरिका, 70 लाख लोगों ने ट्रंप के खिलाफ जताया विरोध

‘नो किंग प्रोटेस्ट’ ने हिलाया अमेरिका, 70 लाख लोगों ने ट्रंप के खिलाफ जताया विरोध

अमेरिका की सड़कों पर लोकतंत्र की गूंज दोबारा बजी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'राजतंत्रवादी' नीतियों के खिलाफ 'नो किंग्स' (कोई राजा नहीं) प्रदर्शनकारियों ने शनिवार को पूरे देश में अभूतपूर्व एकजुटता दिखाई। 2,700 से अधिक शहरों और कस्बों में आयोजित इन रैलियों में करीब 70 लाख लोग शामिल हुए, जो जून 2025 के पहले दौर से भी बड़ा आंकड़ा है। यह प्रदर्शन न केवल ट्रंप प्रशासन की आप्रवासन नीतियों, सैन्यीकरण और अरबपतियों के प्रति पक्षपात का विरोध था, बल्कि अमेरिकी संविधान की रक्षा का संकल्प भी। पीसफुल माहौल में चलीं ये रैलियां दुनिया भर में लोकतंत्र समर्थकों के लिए प्रेरणा बनीं।

'नो किंग्स' आंदोलन की जड़ें जून 2025 में हैं, जब ट्रंप प्रशासन ने बड़े पैमाने पर आप्रवासन छापेमारी (ICE रेड्स) शुरू कीं। हजारों परिवार बिखर गए, और डेमोक्रेटिक शहरों में नेशनल गार्ड तैनाती ने स्थानीय सरकारों को चुनौती दी। इन नीतियों को 'फासीवादी झुकाव' बताते हुए प्रगतिशील संगठन इंडिविजिबल प्रोजेक्ट ने यह अभियान शुरू किया। 50501 मूवमेंट (50 राज्यों, 50 प्रदर्शन, 1 दिन) से प्रेरित यह आंदोलन अमेरिका के हर कोने में फैला।

18 अक्टूबर को हुए दूसरे दौर में प्रदर्शनकारियों ने पीला रंग पहना—शांति और एकजुटता का प्रतीक। कई ने फनी कॉस्ट्यूम्स जैसे inflatable चिकन, फ्रॉग और यूनिकॉर्न पहने, ताकि माहौल हल्का रहे। नारे गूंजे: "यह लोकतंत्र जैसा दिखता है!" और "कोई नफरत नहीं, कोई डर नहीं, अप्रवासी यहां स्वागत योग्य हैं!"। साइनबोर्ड्स पर लिखा था—'ट्रंप राजा नहीं, अमेरिका गणतंत्र है'।

ऑर्गेनाइजर्स के मुताबिक, यह आंदोलन ट्रंप की 'क्राउनिंग' कोशिशों का जवाब था, जहां उन्होंने कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग कर संस्थाओं को कमजोर किया। फेडरल शटडाउन—फंडिंग बिल पर डेमोक्रेट्स से गतिरोध के कारण—ने लाखों फेडरल कर्मचारियों को प्रभावित किया, जो प्रदर्शनों में अपनी पीड़ा बयां कर रहे थे।

देशभर में फैली लहर

प्रदर्शन पूरे 50 राज्यों, वाशिंगटन डीसी और विदेशी शहरों में हुए। न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर में 1 लाख से ज्यादा लोग जमा हुए, जहां चैंट्स ने हाई-राइज बिल्डिंग्स को हिला दिया। चिकागो में अभिनेता जॉन कुसाक ने बोला, "तुम सड़कों पर सैनिक नहीं भेज सकते। अराजकता पैदा कर इंसरक्शन एक्ट का बहाना मत बनाओ!" लॉस एंजिल्स में लैटिनो समुदाय ने परिवारों के बिछड़ने की कहानियां साझा कीं, जबकि अटलांटा—सिविल राइट्स का गढ़—में सीनेटर राफेल वार्नॉक ने कहा, "यह शक्ति लोगों में है, न कि सत्ता वालों में।"

छोटे कस्बों ने भी हिस्सा लिया। नॉर्थ कैरोलिना के हेंडरसनविले में लिन एम्स ने कहा, "छोटे शहरों में लोकतंत्र बचाना जरूरी है, खासकर वहां जहां आवाजें दबी रहती हैं।" नेब्रास्का के लिंकन में बॉबी कैस्टिलो ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर डर जताया। रेड स्टेट्स जैसे टेक्सास और फ्लोरिडा में भी रैलियां हुईं, जहां प्रदर्शनकारी पार्कों और हाईवे पर उतरे।

विदेशों में भी समर्थन मिला। प्राग के जान पालाच स्क्वायर में अमेरिकी और चेक प्रदर्शनकारियों ने वेलवेट रेवोल्यूशन की याद दिलाई। यूरोप और एशिया के शहरों में छोटे ग्रुप्स ने ट्रंप नीतियों का विरोध किया। कुल मिलाकर, 2,700 से ज्यादा इवेंट्स में 70 लाख लोग शामिल हुए—जो अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण प्रदर्शन माना जा रहा है।

प्रदर्शनकारियों की आवाजें: डर, गुस्सा और उम्मीद

सीएनएन की रिपोर्टिंग से मिली कहानियां दिल दहला देने वाली हैं। फ्लिंट, मिशिगन की पेगी कोल ने कहा, "ट्रंप हमारी सरकार को धीरे-धीरे तोड़ रहे हैं। अगर हम चुप रहे, तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।" न्यूयॉर्क की एक बुजुर्ग प्रदर्शनकारी, जो 1960 के दशक से सक्रिय हैं, बोलीं, "हम अधिकार बढ़ाना चाहते थे—महिलाओं, समलैंगिकों, अल्पसंख्यकों के। लेकिन अब सब छीना जा रहा है। प्रेस, न्यायपालिका—सब खतरे में।"

लॉस एंजिल्स की मारिया रिवेरा कमिंग्स ने अप्रवासियों के अधिकारों पर जोर दिया: "हम सब अप्रवासी हैं। हर किसी के अधिकार हैं।" वाशिंगटन डीसी में बिल नाय ने चेतावनी दी, "उन्हें हमारी बोलने की आजादी डराती है। वे लोगों को गिरफ्तार कर रहे हैं, न्याय से वंचित कर रहे हैं।" सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने डीसी रैली में कहा, "यह एक व्यक्ति की लालच नहीं, बल्कि धरती के सबसे अमीर लोगों का षड्यंत्र है, जो अर्थव्यवस्था और राजनीति को हाईजैक कर रहे हैं।"

फेडरल वर्कर्स की पीड़ा अलग थी। एंथनी ली, 20 साल पुराने पब्लिक सर्वेंट, बोले, "सरकारी सेवाओं का विनाश देखना डरावना है।" मोनिका नाम की एक फरलॉड वर्कर ने कहा, "ये नौकरियां खत्म होने से घर, शिक्षा—सपने सब खतरे में हैं।"

ट्रंप प्रशासन की प्रतिक्रिया

ट्रंप ने प्रदर्शनों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा, "मैं कोई राजा नहीं हूं।" लेकिन उनके सहयोगी इन्हें 'वायलेंट लेफ्ट-विंग रेडिकल्स' बता रहे हैं। रिपब्लिकन्स ने इन्हें 'हेट अमेरिका रैलियां' कहा। हालांकि, ज्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे—केवल कुछ जगहों पर झड़पें हुईं, जैसे साउथ कैरोलिना में एक महिला की गिरफ्तारी और जॉर्जिया में धक्कामुक्की।

कानूनी चुनौतियां बढ़ रही हैं। कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने नेशनल गार्ड तैनाती पर मुकदमा किया है। शटडाउन से प्रभावित सेवाएं—हेल्थकेयर, मेडिकेड—प्रदर्शनकारियों के गुस्से को हवा दे रही हैं।

लोकतंत्र की जंग जारी

'नो किंग्स' वेबसाइट के मुताबिक, 21 अक्टूबर को शाम 8 बजे ईटी पर वर्चुअल कॉल होगी, जहां अगले कदम चर्चा होंगे। प्रदर्शनकारियों का संदेश साफ है: अमेरिका में कोई राजा नहीं, शक्ति लोगों के पास। यह आंदोलन न केवल ट्रंप को चुनौती दे रहा, बल्कि वैश्विक स्तर पर तानाशाही के खिलाफ एक मिसाल कायम कर रहा। क्या यह लाखों वोटर्स को 2026 मिडटर्म्स तक जगाएगा? समय बताएगा।

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