logo

BREAKING NEWS
युद्ध के जख्मों के बीच मनाया गया मुहर्रम, कर्बला के शहीदों के साथ हालिया संघर्ष में मारे गए लोगों को भी किया याद

युद्ध के जख्मों के बीच मनाया गया मुहर्रम, कर्बला के शहीदों के साथ हालिया संघर्ष में मारे गए लोगों को भी किया याद

ईरान में इस साल मुहर्रम और आशूरा पहले के मुकाबले ज्यादा भावुक माहौल में मनाया गया। देशभर में लाखों लोगों ने काले कपड़े पहनकर मातमी जुलूस निकाले और इमाम हुसैन की शहादत को याद किया। इस बार का मुहर्रम हालिया युद्ध के बाद आया, इसलिए धार्मिक आयोजनों में युद्ध में जान गंवाने वाले लोगों को भी श्रद्धांजलि दी गई। शहरों और गांवों में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए और शोक सभाओं में शामिल होकर इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद किया।

युद्ध का दर्द भी रहा शामिल

इस बार मुहर्रम के कार्यक्रमों में हालिया संघर्ष की छाप भी साफ दिखाई दी। कई जगहों पर लोगों ने युद्ध में मारे गए सैन्य अधिकारियों, नेताओं और आम नागरिकों को भी श्रद्धांजलि अर्पित की। धार्मिक आयोजनों के दौरान लोगों ने शांति की दुआ की और युद्ध में जान गंवाने वाले लोगों को याद किया। इस कारण इस बार का मुहर्रम धार्मिक आस्था के साथ-साथ हालिया घटनाओं के दर्द से भी जुड़ा नजर आया।

आशूरा पर निकले मातमी जुलूस

मुहर्रम की दसवीं तारीख यानी आशूरा के दिन देशभर में बड़े पैमाने पर मातमी जुलूस निकाले गए। लोगों ने सीना पीटकर मातम किया, नौहे पढ़े और इमाम हुसैन की शहादत को याद किया। जगह-जगह धार्मिक सभाएं आयोजित हुईं, जहां कर्बला की घटना और उसके संदेश पर चर्चा की गई। पूरे माहौल में गम और श्रद्धा दोनों का भाव दिखाई दिया।

कर्बला की कुर्बानी का संदेश

आशूरा का दिन कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है, जब इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उनकी शहादत सत्य, न्याय और इंसानियत की रक्षा का प्रतीक मानी जाती है। इसी कारण हर साल मुहर्रम में उनकी कुर्बानी को श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाता है।

नज़री बांटकर निभाई परंपरा

मुहर्रम के दौरान ईरान में लोगों ने जरूरतमंदों और मातम में शामिल लोगों के बीच नज़री यानी मुफ्त भोजन भी वितरित किया। इसे सेवा, इंसानियत और आपसी सहयोग का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक संगठनों और स्थानीय लोगों ने मिलकर बड़ी संख्या में लोगों तक भोजन पहुंचाया। इस परंपरा को मुहर्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

तासुआ से आशूरा तक श्रद्धा

आशूरा से एक दिन पहले तासुआ भी श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस दिन हजरत अब्बास की कुर्बानी को याद किया गया। ईरान के अलावा दुनिया के कई देशों में भी शिया समुदाय ने मुहर्रम और आशूरा के कार्यक्रम आयोजित किए। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इराक के कर्बला शहर भी पहुंचे, जहां इमाम हुसैन की दरगाह पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस तरह इस साल का मुहर्रम धार्मिक आस्था के साथ युद्ध के दर्द की याद भी अपने साथ लेकर आया।

Leave Your Comment