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खाड़ी में तनाव और महंगे होते उर्वरक: भारत के सामने नई चुनौती

खाड़ी में तनाव और महंगे होते उर्वरक: भारत के सामने नई चुनौती

पश्चिम एशिया यानी खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब धीरे-धीरे दुनिया की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की कीमतों में उछाल ने कई उद्योगों की लागत बढ़ा दी है। इन सबके बीच सबसे ज्यादा चिंता कृषि क्षेत्र को लेकर जताई जा रही है, क्योंकि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का सीधा असर उर्वरकों के दाम पर पड़ता है। भारत में भी यूरिया और डीएपी जैसे प्रमुख खादों की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ने लगी है।

दरअसल उर्वरक उद्योग ऊर्जा पर काफी हद तक निर्भर करता है। यूरिया के उत्पादन में प्राकृतिक गैस मुख्य कच्चा माल होती है। जब गैस महंगी होती है तो यूरिया बनाने की लागत भी बढ़ जाती है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव के कारण गैस की वैश्विक सप्लाई पर दबाव बढ़ा है और LNG की कीमतों में तेजी आई है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में भी तेजी देखने को मिल रही है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतें

हाल के दिनों में उर्वरकों के वैश्विक बाजार में तेजी का माहौल है। कई देशों में यूरिया और डीएपी की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो यूरिया की कीमत 1000 डॉलर प्रति टन के आसपास तक जा सकती है।

मध्य-पूर्व क्षेत्र उर्वरक उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से बड़ी मात्रा में गैस और रसायन दुनिया के कई देशों को निर्यात किए जाते हैं। जब इस क्षेत्र में राजनीतिक या सैन्य तनाव बढ़ता है तो उत्पादन और आपूर्ति दोनों प्रभावित होते हैं। इसका असर सीधे वैश्विक कीमतों पर पड़ता है।

भारत की आयात पर निर्भरता

भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि देशों में से एक है, लेकिन उर्वरकों के मामले में देश पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। विशेष रूप से फॉस्फेट और पोटाश जैसे उर्वरकों के लिए भारत को बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ता है। अनुमान है कि फॉस्फेट आधारित उर्वरकों की जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आता है।

मोरक्को दुनिया में फॉस्फेट भंडार का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है, जबकि कनाडा और बेलारूस पोटाश के प्रमुख उत्पादक हैं। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं तो भारत पर भी इसका दबाव पड़ता है।

बढ़ती मांग और सीमित उत्पादन

भारत में उर्वरकों की मांग लगातार बढ़ रही है। खेती के विस्तार और उत्पादन बढ़ाने की जरूरत के कारण किसानों को बड़ी मात्रा में खाद की आवश्यकता होती है। हाल के वर्षों में यूरिया की बिक्री में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

लेकिन घरेलू उत्पादन उतनी तेजी से नहीं बढ़ पा रहा है। यही वजह है कि आयात पर निर्भरता बनी हुई है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं तो सरकार को या तो ज्यादा सब्सिडी देनी पड़ती है या फिर किसानों पर लागत का दबाव बढ़ने का खतरा होता है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और सप्लाई का खतरा

खाड़ी क्षेत्र में स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। भारत के लिए भी यह मार्ग बेहद अहम है क्योंकि देश को आने वाली ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा भाग इसी रास्ते से होकर आता है।

अगर इस समुद्री मार्ग में किसी तरह की बाधा आती है या सुरक्षा जोखिम बढ़ता है तो ऊर्जा के साथ-साथ उर्वरक उद्योग की सप्लाई चेन भी प्रभावित हो सकती है। इससे गैस और रसायनों की कीमतों में और तेजी आ सकती है।

सरकार पर बढ़ सकता है सब्सिडी का बोझ

भारत में उर्वरक कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार बड़ी मात्रा में सब्सिडी देती है। इससे किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराई जाती है। लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं तो सरकार का सब्सिडी बिल भी बढ़ जाता है।

यदि खाड़ी क्षेत्र का तनाव लंबा चलता है और उर्वरकों की कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो सरकार पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। इससे राजकोषीय संतुलन पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।

किसानों के लिए क्या संकेत?

उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि का सबसे बड़ा असर खेती की लागत पर पड़ता है। अगर खाद महंगी होती है तो किसानों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। इसका असर फसल की कीमतों और खाद्य महंगाई पर भी दिखाई दे सकता है।

हालांकि सरकार कोशिश कर रही है कि किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराए जाएं और कीमतों का दबाव कम से कम हो। लेकिन वैश्विक हालात और ऊर्जा बाजार की दिशा आने वाले समय में इस स्थिति को तय करेगी।

खाड़ी क्षेत्र में बढ़ता तनाव केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था पर भी पड़ता है। भारत जैसे कृषि आधारित देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

यदि ऊर्जा और उर्वरकों की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो खेती की लागत, महंगाई और सरकारी सब्सिडी तीनों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए आने वाले महीनों में पश्चिम एशिया की स्थिति और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भारत की नजर बनी रहना तय है।

Ankit Awasthi

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