गर्मियों में ठंडा फालूदा देखते ही लोगों का मन खुश हो जाता है. गुलाब सिरप, सेवई, मीठी तुलसी के बीज, दूध, जेली और ऊपर से आइसक्रीम के साथ तैयार होने वाली यह मिठाई भारत में काफी लोकप्रिय है. ज्यादातर लोग इसे भारतीय मिठाई मानते हैं, लेकिन इसकी असली कहानी काफी अलग है. आपको जानकर हैरानी होगी कि फालूदा की शुरुआत भारत में नहीं हुई थी, बल्कि यह हजारों किलोमीटर दूर से यहां पहुंचा था.
पारस से शुरू हुई यात्रा
इतिहास के मुताबिक फालूदा की उत्पत्ति पारस यानी आज के ईरान में हुई थी. ईरान के शीराज शहर को फालूदा की जन्मस्थली माना जाता है. वहां इसे "फालुदेह" कहा जाता था. बताया जाता है कि इसकी परंपरा करीब 400 ईसा पूर्व से चली आ रही है. उस समय इसे ठंडक देने वाली खास मिठाई के रूप में खाया जाता था. धीरे-धीरे यह अलग-अलग क्षेत्रों में लोकप्रिय होती गई.
मुगलों के साथ पहुंचा भारत
इतिहासकारों का मानना है कि फालूदा मुगलों के दौर में भारत पहुंचा था. मुगल अपने साथ कई खानपान परंपराएं भी लेकर आए थे और उन्हीं में से एक फालूदा भी था. कहा जाता है कि मुगल बादशाह जहांगीर को यह मिठाई बेहद पसंद थी. इसके बाद यह शाही रसोई से निकलकर आम लोगों तक पहुंची और भारत में अलग-अलग स्वाद और अंदाज के साथ लोकप्रिय होती चली गई.
लखनऊ बना फालूदा का शहर
अगर उत्तर प्रदेश में फालूदा की बात होती है तो सबसे पहले लखनऊ का नाम सामने आता है. नवाबों का शहर लखनऊ आज भी अपने खास फालूदा-कुल्फी स्वाद के लिए जाना जाता है. अमीनाबाद, चौक और हजरतगंज जैसे इलाकों में मिट्टी के कुल्हड़ में ठंडा फालूदा परोसा जाता है. यहां के जगजीवन लाल और प्रकाश कुल्फी वाले पूरे प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में अपनी खास पहचान रखते हैं.
दूसरे शहर भी हैं मशहूर
लखनऊ के अलावा फर्रुखाबाद का मेवा फालूदा भी काफी प्रसिद्ध माना जाता है. गर्मियों में इसे लोग खास पसंद करते हैं. वहीं दिल्ली के करोल बाग, डिफेंस कॉलोनी और तिलक नगर इलाके भी स्वादिष्ट फालूदा के लिए जाने जाते हैं. हालांकि फालूदा प्रेमियों का मानना है कि अगर असली देसी अंदाज में फालूदा का मजा लेना हो, तो लखनऊ का अमीनाबाद आज भी सबसे खास जगहों में गिना जाता है.
