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देशभर में 'वन नेशन वन इलेक्शन' पर जोर: क्या है यह प्रस्ताव और क्यों हो रही है चर्चा?

देशभर में 'वन नेशन वन इलेक्शन' पर जोर: क्या है यह प्रस्ताव और क्यों हो रही है चर्चा?

भारत में चुनावी सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए 'वन नेशन वन इलेक्शन' (One Nation One Election) का प्रस्ताव देशभर में जोर पकड़ रहा है। यह विचार लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने का है, जिससे बार-बार होने वाले चुनावों से होने वाली बाधाओं को कम किया जा सके। हाल ही में लोकसभा ने इस बिल पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की रिपोर्ट की समय सीमा को बढ़ा दिया है, जो इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाता है। इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए दिसंबर 2024 में पेश किए गए संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और संघ राज्य क्षेत्र कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पर विचार-विमर्श जारी है।

'वन नेशन वन इलेक्शन' का विचार 2023 में गठित एक उच्च स्तरीय समिति (HLC) द्वारा दिया गया था, जिसकी अध्यक्षता पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने की। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार विधेयक का उद्देश्य चुनावों को सिंक्रोनाइज करना है, ताकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हों। मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • नया अनुच्छेद 82A: यह अनुच्छेद लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने की व्यवस्था करता है। राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित तिथि से शुरू होकर, राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल लोकसभा के पूर्ण कार्यकाल के साथ समाप्त होगा।
  • समय से पहले विघटन की स्थिति: यदि लोकसभा या कोई विधानसभा समय से पहले भंग होती है, तो नई सभा केवल शेष अवधि के लिए कार्य करेगी।
  • संघ राज्य क्षेत्रों का समावेश: अलग विधेयक के माध्यम से दिल्ली, जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों की विधानसभाओं को भी लोकसभा के साथ जोड़ा जाएगा।
  • स्थानीय निकाय चुनाव: फिलहाल यह प्रस्ताव नगरपालिकाओं और पंचायतों को शामिल नहीं करता, हालांकि HLC रिपोर्ट में इनका जिक्र है।

यह प्रस्ताव 2029 में पहली बार लागू होने की उम्मीद है, जिसके लिए चुनाव आयोग को अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत पड़ेगी, जैसे 48 लाख बैलट यूनिट और 35 लाख कंट्रोल यूनिट, जिनकी अनुमानित लागत 5,300 करोड़ रुपये है।

हालिया विकास और संसदीय प्रक्रिया

दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए इस बिल को 269 मतों से पारित किया गया था, लेकिन विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया। जुलाई 2025 में JPC बैठक में भारी हंगामा हुआ, जहां पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने अपनी राय रखी। अगस्त 2025 में लोकसभा ने JPC की रिपोर्ट की समय सीमा को बढ़ाकर 2025 की शीतकालीन सत्र के अंतिम सप्ताह तक कर दिया, ताकि विधेयकों पर गहन जांच हो सके। समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने इस विस्तार की मांग की थी।

फायदे

समर्थकों का मानना है कि यह प्रस्ताव कई लाभ प्रदान करेगा:

  • आर्थिक बचत: बार-बार चुनावों से होने वाले खर्च में कमी आएगी, जिसमें अभियान, प्रशासनिक और सुरक्षा लागत शामिल हैं।
  • मतदाता भागीदारी: चुनावी थकान कम होने से मतदान प्रतिशत बढ़ सकता है, जैसा कि एक साथ चुनावों में देखा गया है।
  • शासन दक्षता: मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) की वजह से नीति निर्माण में कम बाधा आएगी, जिससे सरकारें विकास पर अधिक ध्यान दे सकेंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे 'समय की पुकार' बताया है, जो देश को स्थिरता और निरंतर विकास प्रदान करेगा।

नुकसान

आलोचकों का कहना है कि यह प्रस्ताव संघीय ढांचे को कमजोर कर सकता है, क्योंकि राज्य स्तर के मुद्दे राष्ट्रीय चुनावों में दब सकते हैं। मध्यावधि सरकार गिरने पर अधिक चुनाव हो सकते हैं, जो उद्देश्य के विपरीत होगा। इसके अलावा, यह संसदीय प्रणाली को राष्ट्रपति शैली की ओर ले जा सकता है, जो भारत की विविधता के अनुकूल नहीं। वैकल्पिक सुझाव जैसे 'वन नेशन, टू इलेक्शन' या MCC में सुधार दिए गए हैं।

देशभर में जागरूकता

देशभर में भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा कॉलेजों और समुदायों में जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, गौतमबुद्धनगर में ओरलियन कॉलेज ऑफ फार्मेसी में छात्रों के बीच गोष्ठी आयोजित की गई, जहां 'स्टूडेंट फॉर वन नेशन वन इलेक्शन' पर चर्चा हुई। मुजफ्फरनगर के एसडी डिग्री कॉलेज में भी इसी विषय पर संगोष्ठी हुई, जहां इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम बताया गया। संतकबीरनगर में पूर्व सांसद हरिश द्विवेदी ने कार्यक्रम में भाग लिया।

सोशल मीडिया पर भी चर्चा जोरों पर है, जहां कुछ यूजर्स इसे चुनावी सौगातों से बचने का तरीका बता रहे हैं, जबकि अन्य विकास के लिए जरूरी मानते हैं। जयपुर ग्रेटर नगर निगम की बैठक में भी इस पर चर्चा होने वाली है।

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