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बंगाल में सियासत पर हावी धर्मयुद्ध और राष्ट्रवाद

बंगाल में सियासत पर हावी धर्मयुद्ध और राष्ट्रवाद

न्यूज प्लस डेस्क, कोलकाता। पश्चिम बंगाल की सियासत पर धर्मयुद्ध और राष्ट्रवाद हावी हो चुके हैं। बंगाल के चुनाव का नेरेटिव सेट हो चुका है, एक नेरेटिव बंगाल में बना तो दूसरी दिल्ली में वंदे मातरम पर बहस के बहाने सेट हो गया। पूरा चुनाव इन्हीं तो मुद्दों पर लड़े जाने के संकेत मिल चुके हैं।

पश्चिम बंगाल में विस की 294 सीटें हैं और बहुमत के लिए 148 विधायकों की जरूरत होती है। भाजपा अभी तक बंगाल में 100 सीटें भी हासिल नहीं कर पायी है, माना जा रहा है जिस तरह बंगाल में धर्मयुद्ध शुरू हुआ है उसमें भाजपा को कुछ फायदा मिलेगा। राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भी भाजपा को कुछ फायदा हो सकता है, लेकिन सबसे ज्यादा फायदा SiR से हो सकता है। इसके बाद भी भाजपा बहुमत तक पहुंच पाएगी किसी के लिए भी कह पाना मुश्किल है।

वैसे तो बंगाल में जब से भाजपा ठीक से सक्रिय हुई है, हिन्दू-मुस्लिम की सियासत बढ़ी है लेकिन धर्मयुद्ध का असली एजेंडा टीएमसी से निकाले गए विधायक हुमाय़ूं कबीर ने सेट किया है। 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद का शिलान्यास कर उन्होंने देश में नई बहस छेड़ दी है, जवाब में हिन्दू संगठन सक्रिय हुए तो सीधे-सीधे धर्मयुद्ध शुरू हो गया। हुमाय़ूं कबीर कबीर ने मुर्शिदाबाद में मस्जिद के शिलान्यास में डेढ़ लाख लोग इकट्ठा किए तो हिन्दू संगठनों ने कोलकाता में सामूहिक गीता पाठ में 5 लाख हुन्दुओं को बिला लिया। यहां पं. धीरेन्द्र शास्त्री ने हिन्दू राष्ट्र का नारा बुलंद किया तो इसकी भी चर्चा पूरे देश में शुरू हो गई। इसके जवाब में हुमायूं कबीर ने कुरान पाठ का ऐलान कर दिया है।

इस बीच हुमायूं कबीर और ओवैसी ने मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी तो माना जाने लगा कि दोनों ममता को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि मुस्लिम वहीं जाएगा जो वास्तव में भाजपा को हरा रहा होगा। भाजपा की ओर से वंदे मातरम् पर बहस कराई गई तो कांग्रेस ने इसे बंगाल चुनाव से जोड़ कर देखा। इसका कारण भी है, वंदे मातरम् वास्तव में बंगाल से ही निकला है इसलिए वहां के लिए इस बहस के बड़े मायनें भी हैं। इस बहस के जरिए हिन्दुओं को एक करने की कोशिश हो सकती है, लेकिन बंगाल के ग्रामीण इलाकों तक भाजपा का मजबूत संगठन न होने से इसमें उसे दिक्कत आ रही है।

SIR में बंगाल में करीब 80 लाख नाम कटने वाले हैं, इनमें 50 लाख ने तो गणना फार्म ही नहीं भरे और करीब 30 लाख लोग ऐसे हैं जिन्होंने फार्म तो भरे लेकिन ब्योरे का मिलान नहीं हो रहा है। ऐसे लोगों को बुलाकर एक बार फिर उनसे साक्ष्य मांगे जाएंगे। कई विधानसभा क्षेत्र तो ऐसे हैं जहां 2003 में जो मतदाता थे सबके गणना फार्म भरे गए हैं, अब चुनाव आयोग ने यहां 2003 में 60 साल ऊपर वाले मतदाताओं की जांच कर पूरा डाटा मांगा है। आयोग मान रहा है कि 22 सालों में कुछ मतदाताओं की तो मृत्यु हुई होगी, लेकिन भाजपा के पास ग्राउंड लेबल पर बीएलए न होने से SIR का भी ज्यादा फायदा मिलता नहीं दिख रहा है। इससे राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि भाजपा का ग्राफ तो बढ़ा है लेकिन रफ्तार उतनी तेज नहीं कि सत्ता में आ सके।

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