न्यूज प्लस, बिहार। बिहार से जाति नहीं जाती का मिथक इस बार बिहारियों ने तोड़ दिया। एनडीए को उम्मीद से बहुत ज्यादा समर्थन मिला, एक चौकाने वाला रिजल्ट आने जा रहा है जिसकी कल्पना एनडीए नेताओं ने भी नहीं की थी।
बिहार चुनाव की कमान संभालने वाले गृहमंत्री अमित शाह ने खुद अपने बयानों में कहा था इस बार 160 से ज्यादा सीटों एनडीए को मिलने जा रही हैं, माना जाता है जब कोई नेता सीटों की बात करता है वह बढ़ा चढ़ाकर ही बोलता है। एग्जिट पोल में 19 में 18 एजेंसियों ने एनडीए को जिता तो रहे थे लेकिन ये एजेंसियां 125 से 160-70 सीटें ही दे रही थीं। सिर्फ एक एजेंसी ने 209 सीटें तक दी थीं। ऐसे में एनडीए गठबंधन जब 200 प्लस पर पहुंच रहा है तो इसके पीछे बिहार की अलग जागरूकता ही दिखती है। पहले वोटिंग की सुनामी और अब रिजल्ट में एनडीए को प्रचंड बहुमत।
यह रिजल्ट तभी संभव था जब बिहार से जातीय समीकरण टूटता, महागठबंधन खासकर आरजेडी का एम-वाई फैक्टर नहीं चला अगर कहा जाए तो मुस्लिम-यादव वाला यह फैक्टर महिला-युवा में बदल गया तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। तमाम यादव बाहुल्य सीटों पर भाजपा जीत रही है तो कई मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर जदयू जीतती दिख रही है। चुनाव में न तो तेजस्वी का नौकरी वाला दांव चला और न महिलाओं को 30 हजार रुपये देने का फार्मूला। तेजस्वी का मुकेश सहनी को जोड़कर अति पिछड़ा वोटों का दांव भी फेल हो गया, खुद सहनी अपना खाता नहीं खोल पाए। महागठबंधन में बिखराव भी उसकी हार का बड़ा कारण बना, 11 सीटों पर फ्रेंडली फाइट हुई इन सभी सीटों पर गठबंधन हार रहा है। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि खुद तेजस्वी यादव की सीट फंस गई, खबर लिखे जाने तक 11वें राउंड की काउंटिंग तक वह 10 हजार वोटों से पीछे हो गए हैं। यहां भी जातीय समीकरण टूटता दिख रहा है, हालांकि यहां भाजपा की तरफ से भी सतीश यादव प्रत्याशी हैं। माना जा रहा है वह यादव वोट काटने के साथ और वोट भी ले रहे हैं। बिहार में अगर जाति नहीं जाती का मिथक टूट रहा है तो इसका अगर आने पिश्चिम बंगाल और खासकर यूपी के चुनावों में दिख सकता है।



