बिहार की धरती, जो कभी क्रांति और त्याग की प्रतीक रही, आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां उसके सबसे बड़े संसाधन, युवा-अपने ही राज्य के भविष्य को लेकर बेचैन हैं।
आपको बता दें 2025 के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले, जब राजनीतिक दल गठबंधनों, जातिगत समीकरणों और पुराने नारों में उलझे हुए हैं, बिहार के युवा कुछ और ही कहानी बुन रहे हैं। वे न तो 'जंगलराज' के भूत से डरते हैं और न ही 'डबल इंजन' की चकाचौंध में बहकते हैं। उनके लिए असली सवाल है: रोजगार, शिक्षा और पलायन का अंत। लेकिन क्या राजनीतिक दलों के एजेंडे में ये मुद्दे उतने ही प्राथमिक हैं जितने युवाओं के दिलों में? एक सर्वे और सड़क पर उतरकर की गई बातचीत से साफ है कि युवाओं की प्राथमिकताएं पार्टियों की रणनीतियों से मीलों दूर हैं।
बिहार की 13 करोड़ आबादी में करीब 8 करोड़ लोग 25 वर्ष से कम उम्र के हैं। ये युवा शक्ति न केवल राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, बल्कि आने वाले चुनावों का निर्णायक वोट बैंक भी। लेकिन हाल के वर्षों में बेरोजगारी की दर 20% से ऊपर बने रहने और हर साल लाखों युवाओं के पलायन ने उनकी उम्मीदों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पटना के गांधी मैदान में, जहां कभी युवा सरकारी नौकरियों के लिए शारीरिक परीक्षा की तैयारी करते थे, आज चुनावी सभाओं का बोलबाला है। एक छात्र, राहुल कुमार (नाम परिवर्तित), जो बीपीएससी की तैयारी कर रहे हैं, कहते हैं, "हमारी जिंदगी चुनावी वादों के इर्द-गिर्द घूम रही है, लेकिन असल मुद्दे कहीं गुम हैं। पेपर लीक हो जाते हैं, परीक्षाएं टलती हैं, और जब हम सड़क पर उतरते हैं तो लाठियां पड़ती हैं।"
युवाओं के मुद्दे राजनीतिक दलों के एजेंडे से कैसे अलग हैं? पार्टियां तो जाति-धर्म के आधार पर वोट मांग रही हैं। एनडीए की ओर से नीतीश कुमार ने वादा किया है कि अगले पांच वर्षों में एक करोड़ नौकरियां पैदा की जाएंगी। वहीं, महागठबंधन के तेजस्वी यादव युवाओं को 'पलायन रोक-नौकरी दो' यात्रा के जरिए लुभा रहे हैं। लेकिन युवा इन वादों को खोखला मानते हैं। एक हालिया सर्वे के मुताबिक, 70% युवा मानते हैं कि सरकारी नौकरियां तो ठीक हैं, लेकिन वे स्थानीय उद्योग, स्टार्टअप और स्किल डेवलपमेंट चाहते हैं—ऐसी नौकरियां जो बिहार की मिट्टी से जुड़ी हों। पार्टियां विकास की बात तो करती हैं, लेकिन फोकस सड़क, बिजली और नल-जल पर रहता है, जबकि युवा पूछते हैं: "ये बुनियादी सुविधाएं तो हो गईं, अब आईटी पार्क, एमएनसी और क्रिकेट स्टेडियम कब आएंगे?"
शिक्षा का क्षेत्र तो युवाओं के लिए सबसे बड़ा दर्द है। बिहार के 81% स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा नहीं है, विश्वविद्यालयों में सेशन लेट चलते हैं, और ड्रॉपआउट रेट चिंताजनक स्तर पर है। कॉलेज स्टूडेंट्स बताते हैं कि अनियमित जॉब पोस्टिंग और पेपर लीक ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया है। एक छात्रा, प्रिया सिंह, जो पटना विमेंस कॉलेज में पढ़ती हैं, कहती हैं, "हम पहली बार वोट डालने जा रहे हैं, लेकिन विकल्प 'सबसे बुरे और बुरे' के बीच ही है। हम ऐसी सरकार चाहते हैं जो मेरिट पर भर्ती करे, न कि भ्रष्टाचार पर।" कांग्रेस की 'पलायन रोक-नौकरी दो' यात्रा ने इन मुद्दों को उठाया है, लेकिन युवा कहते हैं कि ये राजनीतिक स्टंट ज्यादा लगते हैं।
पलायन बिहार के युवाओं का सबसे बड़ा घाव है। हर साल 20 लाख से ज्यादा युवा दिल्ली, मुंबई या कोटा की ओर रुख करते हैं—कभी नौकरी के लिए, कभी कोचिंग के लिए। एक एक्स पोस्ट में युवा नेता ने लिखा, "बिहार में आईटी पार्क नहीं, एमएनसी नहीं, नाइट लाइफ नहीं। हम वीकेंड पर परिवार को घुमाने भी 100-150 किमी दूर जाना पड़ता है।" पार्टियां तो 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' का नारा दे रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर निवेश की कमी है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी युवाओं को स्थानीय रोजगार का वादा कर रही है—जैसे हर जिले में स्टार्टअप नेटवर्क और टेक ट्रेनिंग। लेकिन युवा चाहते हैं कि ये वादे कागज पर न रहें, बल्कि अमल में आएं।
तो 2025 में बिहार के युवा कैसी सरकार चाहते हैं? एक ऐसी सरकार जो पारदर्शी हो, भ्रष्टाचार मुक्त हो और युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करे। वे मांग कर रहे हैं:
- रोजगार में क्रांति: एक करोड़ नौकरियां, लेकिन गुणवत्ता वाली—उद्योग स्थापना, फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स और जूट मिलों से। बिहार को 'माइग्रेशन मिल' से 'मेरिट हब' बनाना।
- शिक्षा सुधार: हर प्रखंड में डिग्री कॉलेज, डिजिटल लाइब्रेरी, प्लेसमेंट सेल और SC/ST/OBC महिलाओं के लिए मुफ्त शिक्षा KG से PG तक। पेपर लीक पर सख्त कानून और शैक्षणिक कैलेंडर का पालन।
- स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर: ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर अस्पताल, 24 घंटे बिजली और नदियों को जोड़ने की योजना बाढ़ से निजात के लिए।
- युवा सशक्तिकरण: बिहार युवा आयोग को मजबूत बनाना, जहां उनकी आवाज सुनी जाए। स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड को 4 लाख तक बढ़ाना और स्किल ट्रेनिंग।
एक एक्स यूजर ने लिखा, "युवा अब अवसर चाहते हैं, न कि सिर्फ नौकरी। हम बिहार छोड़ना नहीं चाहते, बल्कि यहीं बदलाव लाना चाहते हैं।" तेजस्वी यादव की 'छात्र युवा संसद' और मोदी जी के कौशल विश्वविद्यालय जैसे कदम सकारात्मक हैं, लेकिन युवा कहते हैं कि इन्हें अमल में लाना होगा।



