असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी में भी चुनाव हो रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा पश्चिम बंगाल की है। वजह साफ है कि यहां सीधी टक्कर भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच है। बाकी राज्यों में मुकाबला एकतरफा या क्षेत्रीय हो सकता है, लेकिन बंगाल में सियासत पूरी तरह टकराव वाली दिख रही है।
बाकी राज्यों का अलग माहौल
अगर बाकी राज्यों की बात करें तो असम में भाजपा मजबूत नजर आ रही है, जबकि केरल में कांग्रेस को बढ़त मिलती दिखती है। वहीं तमिलनाडु और पुदुचेरी में क्षेत्रीय दलों का दबदबा है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर की सबसे बड़ी लड़ाई सिर्फ बंगाल में ही दिख रही है।
ममता की मजबूत पकड़ के कारण
ममता बनर्जी की सरकार लंबे समय से सत्ता में है और उनकी पकड़ अब भी मजबूत मानी जा रही है। उनकी तीन बड़ी ताकतें बताई जा रही हैं, जिसमें कमजोर विपक्ष, जनता को दी जा रही योजनाएं और उनकी ‘फाइटर’ छवि शामिल है। यही वजह है कि वह फिर से सत्ता में वापसी का भरोसा रखती हैं।
भाजपा की रणनीति और चुनौतियां
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा इस बार पूरी ताकत लगा रही है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा अभी तक बंगाल में बड़ा जन आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई है। बेरोजगारी और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दे होने के बावजूद पार्टी को मजबूत लहर बनाने में मुश्किल हो रही है।
चुनावी मुद्दों ने बदला माहौल
इस बार चुनाव में नए मुद्दे भी देखने को मिल रहे हैं। ममता बनर्जी ने मछली जैसे स्थानीय मुद्दे को उठाकर लोगों से जुड़ने की कोशिश की है। साथ ही मंदिर और धार्मिक नारों को लेकर भी दोनों पक्षों में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। इससे साफ है कि चुनाव अब सिर्फ राजनीति नहीं बल्कि संस्कृति और पहचान की लड़ाई भी बन गया है।
क्यों इतना अहम है यह चुनाव
बंगाल चुनाव भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है। पार्टी देश के कई राज्यों में सरकार बना चुकी है, लेकिन बंगाल अब भी उसके लिए चुनौती बना हुआ है। वहीं ममता बनर्जी खुद को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत नेता के रूप में स्थापित करना चाहती हैं। ऐसे में यह चुनाव सिर्फ राज्य का नहीं बल्कि देश की राजनीति का बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
