समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खान ने कभी न छिपाया है कि जेल की चारदीवारी ने उनके जीवन को कैसे तोड़-मरोड़ दिया। लेकिन हाल ही में वरिष्ठ वकील और पूर्व सांसद कपिल सिब्बल के पॉडकास्ट 'बीच बहस' में उन्होंने एक ऐसा दर्दनाक किस्सा साझा किया, जिसने सुनने वालों की रूह कांपा दी। 2023 का वह काला अध्याय, जब रामपुर जेल से उन्हें और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को अलग-अलग जेलों में शिफ्ट किया गया, आज भी आजम के दिलो-दिमाग पर भारी पड़ता है।
"जेल बदली तो लगा जैसे एनकाउंटर हो जाएगा," आजम ने बताया। फिर बेटे को सीने से लगाकर कहा, "बेटा, जिंदगी रही तो फिर मिलेंगे। नहीं तो ऊपर मिलेंगे।" यह शब्द न सिर्फ पिता-पुत्र के बंधन की गहराई दर्शाते हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'एनकाउंटर राज' की काली सच्चाई को भी उजागर करते हैं।
आजम खान, जो एक समय अखिलेश यादव के सबसे करीबी सहयोगी माने जाते थे, पिछले छह वर्षों से विभिन्न मुकदमों के सिलसिले में जेल की हवा खा रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद उन पर दर्जनों केस चले, जिनमें से कई को अदालत ने बाद में खारिज कर दिया। लेकिन 2023 का वह जेल ट्रांसफर आजम के लिए मौत का पैगाम बन गया था। 21 अक्टूबर 2023 को उत्तर प्रदेश पुलिस ने आजम और अब्दुल्ला को रामपुर जेल से बाहर निकाला। पिता-पुत्र को अलग-अलग वाहनों में बिठाया गया—आजम को सीतापुर जेल भेजा गया, जबकि बेटे को बरेली भेज दिया। यह ट्रांसफर कोई साधारण प्रक्रिया नहीं था। उसके ठीक पहले प्रयागराज में माफिया अतीक अहमद और उनके भाई अशरफ का एनकाउंटर हो चुका था, जिसमें पुलिस ने कोर्ट परिसर में ही गोली मार दी थी। अतीक की तरह आजम को भी लगने लगा कि यह उनका अंतिम सफर है।
पॉडकास्ट में आजम ने कपिल सिब्बल से कहा, "उस रात मुझे नींद नहीं आई। बेटे की जान का डर सताने लगा। क्या पता, रास्ते में ही 'एनकाउंटर' कर दिया जाए। मैंने अब्दुल्ला को आखिरी बार गले लगाया और कहा—बेटा, अगर जिंदगी बची रही तो फिर मिलेंगे। नहीं तो ऊपर वाले के दरबार में मिलेंगे।" यह शब्द सुनकर सिब्बल भी भावुक हो गए। उन्होंने पूछा, "क्या आपको वाकई लगा कि राज्य की मशीनरी आपको खत्म कर देगी?" आजम ने जवाब दिया, "हां, क्योंकि अतीक का केस अभी ताजा था। हमें लगा कि यह साजिश है। तीन रातें गुजरीं, जब पिता-पुत्र अलग हो गए। हर पल मौत का इंतजार था।"
यह किस्सा सिर्फ व्यक्तिगत दर्द नहीं, बल्कि यूपी की राजनीतिक साजिशों का आईना है। आजम खान पर 2012 के विधानसभा चुनाव में धोखाधड़ी, 2019 में हेट स्पीच और रामपुर नगर निगम के भू-माफिया मामलों जैसे कई इल्जाम लगे। इनमें से कुछ केस सीबीआई जांच की मांग के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। जुलाई 2024 में आजम को जमानत मिली, लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण वे अभी भी सीमित सक्रियता दिखा रहे हैं। अब्दुल्ला आजम, जो स्वरोजगार मंत्री रह चुके हैं, पर भी कई मुकदमे चल रहे हैं। पिता-पुत्र की यह जोड़ी समाजवादी पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक का प्रतीक रही है, लेकिन बीजेपी सरकार के आने के बाद उन्हें निशाना बनाया गया, ऐसा विपक्ष का दावा है।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस किस्से पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "आजम भाई का दर्द हम सबका दर्द है। एनकाउंटर की राजनीति ने लोकतंत्र को कलंकित कर दिया है।" वहीं, बीजेपी ने इसे 'ड्रामा' करार दिया। प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने ट्वीट किया, "आजम खान हमेशा से विवादों के केंद्र में रहते हैं। जेल ट्रांसफर सुरक्षा के लिए था, न कि साजिश।" लेकिन मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंडिया ने चिंता जताई है। उनके प्रवक्ता ने कहा, "यूपी में 200 से ज्यादा कथित एनकाउंटर हुए हैं, जिनमें अल्पसंख्यक समुदाय प्रभावित ज्यादा दिखा। आजम का अनुभव इसकी पुष्टि करता है।"
आजम का यह खुलासा राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और सपा मुस्लिम-यादव गठजोड़ को मजबूत करने के लिए आजम जैसे नेताओं की वापसी चाहती है। लेकिन स्वास्थ्य समस्याओं—जैसे डायबिटीज और किडनी की बीमारी—से जूझ रहे आजम की सक्रियता सीमित है। पॉडकास्ट में उन्होंने कहा, "जेल ने मुझे तोड़ दिया, लेकिन इंसानियत नहीं छीनी। अब मैं बस न्याय की लड़ाई लड़ रहा हूं।" बेटे अब्दुल्ला ने भी एक बयान जारी कर कहा, "पापा का डर जायज था। लेकिन अल्लाह ने बचाया।"



