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आजम पर फिर कानूनी चोट, मिशन-2027 से पहले सपा की बढ़ी मुश्किल?

आजम पर फिर कानूनी चोट, मिशन-2027 से पहले सपा की बढ़ी मुश्किल?

कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान एक बार फिर कानूनी फैसले को लेकर चर्चा में हैं। 2019 लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए विवादित बयान मामले में रामपुर की एमपी-एमएलए कोर्ट ने उन्हें दोषी मानते हुए 2 साल की सजा सुनाई है। फैसले के बाद एक बार फिर सियासी हलकों में हलचल बढ़ गई है और मिशन-2027 से पहले इसे सपा के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है।

2017 के बाद बदली तस्वीर
करीब 9 साल पहले तक आजम खान उत्तर प्रदेश की राजनीति में बेहद प्रभावशाली चेहरा माने जाते थे। समाजवादी पार्टी सरकार में उनका बड़ा कद था और वे पार्टी के प्रमुख रणनीतिक चेहरों में शामिल थे। लेकिन 2017 में प्रदेश की सत्ता बदलने के बाद हालात तेजी से बदल गए। इसके बाद उनके खिलाफ कई कानूनी कार्रवाई शुरू हुईं और एक के बाद एक कई मामले सामने आते गए।

मुकदमों की लंबी सूची
जानकारी के मुताबिक आजम खान पर 90 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए। कई मामलों में उन्हें अदालत से राहत मिली तो कई में सजा भी सुनाई गई। ताजा मामला उस चुनावी बयान से जुड़ा है जिसमें अधिकारियों को लेकर की गई टिप्पणी विवाद में आ गई थी। अभियोजन पक्ष ने इसे प्रशासनिक गरिमा और चुनावी नियमों से जुड़ा गंभीर मामला बताया था।

कई मामलों में हो चुकी सजा
आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को दो पैन कार्ड मामलों में सजा मिल चुकी है। इसके अलावा फर्जी दस्तावेज, डूंगरपुर कॉलोनी विवाद, भड़काऊ भाषण और अन्य मामलों में भी अदालतें फैसला सुना चुकी हैं। कई मामलों में उन्हें अलग-अलग अवधि की सजा मिली है। हालांकि कुछ मामलों में राहत भी मिली लेकिन कानूनी चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं।

जेल से बाहर आने पर सवाल
फिलहाल आजम खान रामपुर जेल में बंद हैं। दो पैन कार्ड मामलों में सुनाई गई सजा अभी भी प्रभावी मानी जा रही है। ऐसे में ताजा फैसले के बाद भी उनकी तत्काल रिहाई आसान नहीं दिखाई दे रही। उनके वकीलों की तरफ से ऊपरी अदालतों में राहत की कोशिश जारी बताई जा रही है और अब नजर आगे की कानूनी प्रक्रिया पर है।

मिशन-2027 पर भी चर्चा
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में आजम खान की राजनीतिक पकड़ लंबे समय तक प्रभावशाली रही है। ऐसे में उनके लगातार कानूनी मामलों में घिरे रहने से समाजवादी पार्टी की रणनीति पर भी असर पड़ सकता है। मिशन-2027 की तैयारी के बीच अब देखने वाली बात होगी कि पार्टी आगे किस नई रणनीति के साथ मैदान में उतरती है और आने वाले समय में कानूनी मोर्चे पर क्या बदलाव देखने को मिलते हैं।

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