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30 जून से शुरू होगा आषाढ़ माह, इन गलतियों से रहें दूर, वरना शुभ फल की जगह बढ़ सकती हैं परेशानियां

30 जून से शुरू होगा आषाढ़ माह, इन गलतियों से रहें दूर, वरना शुभ फल की जगह बढ़ सकती हैं परेशानियां

सनातन धर्म में आषाढ़ माह को बेहद पवित्र माना जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार इस साल आषाढ़ माह 30 जून 2026 से शुरू होकर 29 जुलाई 2026 तक रहेगा। इसी दिन आषाढ़ पूर्णिमा भी मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता है कि इसी महीने भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं और देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत होती है। इस पूरे समय को भक्ति, साधना और आत्मसंयम का विशेष काल माना जाता है।

इन कामों से करें परहेज

आषाढ़ माह में चातुर्मास शुरू होने के बाद विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान बासी भोजन, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से भी दूरी रखनी चाहिए। इसके अलावा तली-भुनी और ज्यादा मसालेदार चीजें खाने से बचने की सलाह दी जाती है। झगड़ा, कटु वचन और किसी का अपमान करने से भी बचना चाहिए।

खानपान में रखें सावधानी

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ माह में कुछ खाद्य पदार्थों से भी परहेज करना चाहिए। पत्तेदार सब्जियां, बैंगन और मसूर की दाल का सेवन न करने की सलाह दी जाती है। इसकी जगह मौसमी और रसीले फल जैसे तरबूज, खरबूजा और खीरा खाने को शुभ माना गया है। सात्विक भोजन और संयमित दिनचर्या अपनाने से शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं।

इन कार्यों से मिलेगा शुभ फल

आषाढ़ माह में रोज सुबह स्नान के बाद तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल अर्पित करना शुभ माना जाता है। भगवान विष्णु की पूजा, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, मंत्र जाप, ध्यान और धार्मिक साधना करने का विशेष महत्व बताया गया है। एकादशी, अमावस्या और पूर्णिमा के दिन पवित्र नदी में स्नान और दान-पुण्य करने से भी पुण्य फल मिलने की मान्यता है।

दान-पुण्य का भी है महत्व

इस पूरे महीने जरूरतमंद लोगों की मदद करना भी बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छाता, चप्पल, पानी से भरपूर फल और अन्य जरूरत की वस्तुओं का दान करना लाभकारी माना जाता है। माना जाता है कि सेवा और दान से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

क्यों खास माना जाता है यह महीना

आषाढ़ माह भगवान विष्णु की भक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण महीनों में गिना जाता है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार महीने बाद देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। इसी कारण चातुर्मास के दौरान मांगलिक कार्यों पर विराम रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय पूजा-पाठ, जप, तप, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना के लिए सबसे उत्तम माना जाता है।

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