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अफगानिस्तान ने पाकिस्तान को पानी देने से किया इनकार, भारत की तरह दिखाया सख्त रुख

अफगानिस्तान ने पाकिस्तान को पानी देने से किया इनकार, भारत की तरह दिखाया सख्त रुख

पाकिस्तान के लिए पानी का संकट अब दोहरी चुनौती बन गया है। एक ओर भारत ने अप्रैल में सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) को निलंबित कर दिया, वहीं दूसरी ओर तालिबान शासित अफगानिस्तान कुनार नदी पर डैम बनाने की तैयारी में जुटा है। यह कदम पाकिस्तान को आने वाले पानी की आपूर्ति को सीमित करने का स्पष्ट संकेत देता है। अफगानिस्तान के सर्वोच्च नेता मौलवी हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने हाल ही में कुनार नदी पर जलविद्युत परियोजना को तेजी से पूरा करने का आदेश जारी किया है, जिससे पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सिंचाई और कृषि पर गहरा असर पड़ सकता है।

यह विकास भारत के आईडब्ल्यूटी निलंबन के ठीक छह माह बाद आया है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए एक भयानक आतंकी हमले के बाद, जिसमें 26 पर्यटक मारे गए थे, भारत ने 23 अप्रैल को 1960 की सिंधु जल संधि को राष्ट्रीय सुरक्षा के हवाले से अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया। संधि के तहत भारत को सिंधु की पूर्वी सहायक नदियों (रावी, ब्यास और सतलज) पर पूर्ण नियंत्रण था, जबकि पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम और चेनाब) पाकिस्तान को आवंटित थीं। निलंबन के बाद भारत ने इन नदियों पर नए बांध और जलाशय बनाने की योजना तेज कर दी, जिससे पाकिस्तान को सालाना 80 लाख एकड़ फीट पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह कदम आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले पड़ोसी के खिलाफ 'जल-आधारित प्रतिक्रिया' है।

अफगानिस्तान का यह नया कदम भारत की रणनीति से प्रेरित लगता है। कुनार नदी, जो अफगानिस्तान के नंगरहर प्रांत से निकलकर पाकिस्तान में चित्राल नदी के रूप में विलीन हो जाती है, काबुल नदी की प्रमुख सहायक नदी है। काबुल नदी पाकिस्तान में सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है और इसकी अधिकांश आपूर्ति अफगानिस्तान से आती है। तालिबान सरकार के ऊर्जा एवं जल मंत्रालय ने पुष्टि की है कि डैम का निर्माण जलविद्युत उत्पादन और स्थानीय सिंचाई के लिए किया जाएगा, लेकिन पाकिस्तानी विशेषज्ञों का कहना है कि इससे नदी का प्रवाह 30-40 प्रतिशत तक कम हो सकता है। अफगान विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, "यह परियोजना हमारे राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए है। पानी का उपयोग हम करेंगे और फिर कुनार में लौटाएंगे, लेकिन प्राकृतिक प्रवाह सीमित होगा।" यह बयान पाकिस्तान के लिए चेतावनी की घंटी है, जहां पहले से ही जल संकट गहरा रहा है।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है, और सिंधु बेसिन प्रणाली देश की 80 प्रतिशत कृषि भूमि को सिंचित करती है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आबादी के कारण पाकिस्तान 2025 तक 'जल-तंग' देश बन चुका है। भारत के आईडब्ल्यूटी निलंबन से पहले ही पाकिस्तान को 20 प्रतिशत पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा था, और अब अफगानिस्तान का डैम प्रोजेक्ट इसे और जटिल बना देगा। लाहौर के एक जल विशेषज्ञ, डॉ. अहमद हसन ने कहा, "कुनार नदी पर डैम से चित्राल घाटी में सूखा पड़ सकता है, जो पाकिस्तान की फल-सब्जी उत्पादन का केंद्र है। यह भारत-अफगानिस्तान की अनौपचारिक 'जल गठबंधन' जैसा लगता है।" पाकिस्तानी सरकार ने इसकी कड़ी निंदा की है और संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की मांग की है, लेकिन अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच कोई औपचारिक जल-साझेदारी संधि न होने से कानूनी आधार कमजोर है।

इस घटनाक्रम का पृष्ठभूमि में क्षेत्रीय भू-राजनीति छिपी है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच डुरांड लाइन पर सीमा तनाव पिछले महीनों से बढ़ा है। अक्टूबर की शुरुआत में दोनों पक्षों के बीच गोलीबारी में दर्जनों सैनिक मारे गए, जिसके बाद तालिबान ने 'रक्त नदी साथ नहीं बह सकती' जैसे बयान दिए। विशेषज्ञों का मानना है कि जल विवाद को सीमा संघर्ष का हथियार बनाया जा रहा है। भारत के लिए यह स्थिति फायदेमंद है, क्योंकि आईडब्ल्यूटी निलंबन के बाद दिल्ली ने लद्दाख और जम्मू में नए जलाशयों का निर्माण शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में संसद में कहा, "जल सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है। हम किसी की दया पर नहीं रहेंगे।" दूसरी ओर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसे 'युद्ध का कार्य' करार दिया है।

अफगानिस्तान की डैम परियोजना का इतिहास पुराना है। 1970 के दशक में सोवियत काल में कुनार पर छोटे बांध बनाए गए थे, लेकिन तालिबान के सत्ता में आने के बाद ऊर्जा संकट ने इसे प्राथमिकता दी। मंत्रालय के अनुसार, डैम से 300 मेगावाट बिजली उत्पादन होगा, जो अफगानिस्तान के ग्रामीण क्षेत्रों को रोशन करेगा। लेकिन पर्यावरणविदों की चिंता है कि इससे नदी पारिस्थितिकी प्रभावित होगी। ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालयी नदियों पर बांधों से बाढ़ और सूखे का खतरा बढ़ेगा। पाकिस्तान ने अफगान दूतावास में आपत्ति दर्ज की है, लेकिन तालिबान ने इसे 'आंतरिक मामला' बताया।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया मिली-जुली है। संयुक्त राष्ट्र के जल विशेषज्ञ ने चेतावनी दी है कि दक्षिण एशिया में जल युद्ध की आशंका बढ़ रही है। अमेरिका और चीन जैसे देश चुप्पी साधे हैं, जबकि ईरान ने मध्यस्थता की पेशकश की है। भारत-अफगानिस्तान संबंधों में सुधार के संकेत भी दिख रहे हैं; नई दिल्ली ने हाल ही में काबुल को मानवीय सहायता भेजी है। लेकिन विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बातचीत ही एकमात्र रास्ता है।

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