उत्तर प्रदेश की राजनीति में वेस्ट यूपी को सबसे अहम माना जाता है और यहीं से सत्ता का रास्ता निकलता है। यही वजह है कि सभी दल अपने चुनावी अभियान की शुरुआत इसी क्षेत्र से करते हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 व 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां मजबूत प्रदर्शन किया था। हालांकि 2024 के चुनाव में उसे झटका लगा और कई सीटें सपा-कांग्रेस गठबंधन के खाते में चली गईं।
2024 के फॉर्मूले पर 2027 की तैयारी
अखिलेश यादव अब 2027 के चुनाव के लिए उसी रणनीति पर काम कर रहे हैं, जिसने 2024 में बीजेपी को चुनौती दी थी। उनका साफ संदेश है कि सीट और सिंबल से ज्यादा जरूरी जीत है। यानी जो उम्मीदवार जीत सकता है, उसे ही मैदान में उतारा जाएगा, चाहे वह किसी भी दल से जुड़ा हो। यह फॉर्मूला गठबंधन को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
सिंबल से ज्यादा कैंडिडेट पर फोकस
नई रणनीति के तहत कुछ सीटों पर “सिंबल हमारा-कैंडिडेट तुम्हारा” या “सिंबल तुम्हारा-कैंडिडेट हमारा” जैसे प्रयोग किए जा सकते हैं। इसका मकसद साफ है कि वोट बंटने से रोका जाए और मजबूत उम्मीदवार को मौका मिले। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी के बीच तालमेल इसी आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है।
गठबंधन में कड़वाहट से बचने की कोशिश
सपा नेतृत्व का मानना है कि गठबंधन में अगर सीटों को लेकर विवाद हुआ तो इसका फायदा सीधे बीजेपी को मिलेगा। इसलिए सहयोगी दलों को संदेश दिया जा रहा है कि प्राथमिकता जीत होनी चाहिए। 2024 में भी इसी सोच के साथ सीट बंटवारा हुआ था, जिससे बेहतर परिणाम देखने को मिले थे। अब उसी तालमेल को 2027 में और मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
पार्टी नेताओं का क्या कहना है
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि 2027 के चुनाव में 2024 का ही प्लान लागू रहेगा। पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को साथ लेकर आगे बढ़ा जाएगा। नेताओं का मानना है कि गठबंधन में अगर सही उम्मीदवार को प्राथमिकता दी जाए, तो जीत की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
2027 में सीधा मुकाबला तय
प्रदेश में 2027 के चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। एक तरफ बीजेपी अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर सपा-कांग्रेस गठबंधन मजबूत रणनीति के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है। वेस्ट यूपी से शुरू हुई यह रणनीति पूरे राज्य में लागू हो सकती है, जिससे मुकाबला और भी दिलचस्प होने की संभावना है।
