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विश्व हिंदी दिवस: डिजिटल दौर में धूल झाड़कर 'सुल्तान' बनी हिंदी, जानिए अपनी भाषा की असली ताकत के बारे में

[Edited By: Gaurav]

Saturday, 14th September , 2019 05:16 pm

''हिंदी है तो हैं हम, बिन हिंदी हम क्या हैं, हिंदी से बढ़ती देश की शान है'' विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और सरल भाषा हिंदी यूं ही नहीं बन गई। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आज के डिजिटल दौर की वजह से हिंदी का प्रचार-प्रसार पहले से भी ज्यादा तेज गति से हो रहा है।
2016 में डिजिटल माध्यम में हिंदी समाचार पढ़ने वालों की संख्या 5.5 करोड़ थी, जो 2021 में बढ़कर 14.4 करोड़ होने का अनुमान है। 2021 में अंग्रेजी की तुलना में हिंदी में इंटरनेट उपयोग करने वालों की संख्या अधिक हो जाएगी। अनुमान के मुताबिक 20.1 करोड़ लोग हिंदी उपयोग करने लगेंगे। गूगल के अनुसार हिंदी में कंटेंट पढ़ने वाले हर साल 94 फीसद बढ़ रहे हैं, जबकि अंग्रेजी में यह दर सालाना 17 फीसद है।

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कुछ इस तरह बढ़ा हिंदी का दायरा

इसे हिंदी की ही ताकत कहेंगे कि अब लगभग सभी विदेशी कंपनियां हिंदी को बढ़ावा दे रही हैं। यहां तक कि दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल में पहले जहां अंग्रेजी को बढ़ावा दिया जाता था वहीं गूगल अब हिंदी को भी प्राथमिकता दे रहा है। हाल ही में ई-कॉमर्स साइट अमेजन इंडिया ने अपना हिंदी एप लांच किया है। ओएलएक्स, क्विकर जैसे प्लेटफॉर्म पहले ही हिंदी में उपलब्ध है। स्नैपडील जैसी ऑनलाइन शॉपिंग साइट भी हिंदी में है।

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इस वजह से मनाया जाता है हिंदी दिवस

यह निर्णय 14 सितम्बर को लिया गया, इसी दिन हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार व्यौहार राजेन्द्र सिंहा का 50वां जन्मदिन था, इस कारण हिंदी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया था। हालांकि जब राष्ट्रभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो गैर-हिंदी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे और अंग्रेज़ी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। इस कारण हिंदी में भी अंग्रेज़ी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। इस निर्णय के बाद हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 1953 से पूरे भारत में 14 सितंबर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

मैं दुनिया की सभी भाषाओं का सम्मान करता हूं, पर मेरे देश में हिंदी का सम्मान न हो, यह मैं सह नहीं सकता। आचार्य विनोबा भावे

मैं उन लोगों में से हूं, जिनका विचार है और जो चाहते हैं कि हिंदी ही राष्ट्रभाषा हो सकती है।
बाल गंगाधर तिलक

 

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