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क्या है सूर्य की उपासना के छठ पर्व का महत्व- जानिये

[Edited By: Vijay]

Monday, 8th November , 2021 12:26 pm

आस्था का महापर्व छठ पूजा हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। छठ पूजा सूर्य देव की उपासना और प्रकृति प्रेम का सबसे बड़ा उदाहरण है। छठ महापर्व का चार दिवसीय अनुष्ठान नहाय खाय के साथ शुरू होता है। नहाय खाय के अगले दिन उपवास रख व्रती खरना पूजन करती हैं, इसके अगले दिन भगवान भास्कर को पहला अघ्र्य शाम को दिया जाता है।

छठ के अंतिम दिन प्रात: काल उदयीमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है, और इसके साथ ही चार दिवसीय अनुष्ठान पूरा होता है। ज्योतिषाचार्य विभोर इंदुसूत ने बताया कि नहाए खाय के साथ शुरू होने वाली छठ पूजा का पहला दिन 8 नवंबर दिन सोमवार को हैं। छठ पूजा का दूसरा दिन खरना 9 नवंबर को है, पूजा में खरना का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत रखा जाता है, और रात में खीर का प्रसाद प्रसाद ग्रहण किया जाता है। छठ पूजा का तीसरा दिन संध्या अघ्र्य 10 नवंबर दिन बुधवार को है। षष्ठी तिथि 9 नवंबर को शुरू होकर 10 नवंबर तक रहेगी।

छठ पूजा से जुड़ी एक मान्यता है कि इसकी शुरुआत महाभारत काल से हुई जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए थे। तब द्रोपदी ने चार दिनों तक इस व्रत को किया था। द्रोपदी ने सूर्य देव की उपासना कर उनसे अपना राजपाट वापस मांगा था।

इसके अलावा महाभारत काल से एक कथा और जुड़ी हुई है कि कर्ण भी भगवान सूर्य देव का परम भक्त थे और घंटो पानी में खड़े होकर सूर्य देव की उपासना किया करते थे। जिससे प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें महान योद्धा बनने का आशीर्वाद दिया था।

छठ पूजा का महत्व बहुत ज्यादा है। यह व्रत सूर्य भगवान, उषा, प्रकृति, जल, वायु आदि को समर्पित है। इस त्यौहार को मुख्यत: बिहार में मनाया जाता है। इस व्रत को करने से नि:संतान दंपत्तियों को संतान सुख प्राप्त होता है। कहा जाता है कि यह व्रत संतान की रक्षा और उनके जीवन की खुशहाली के लिए किया जाता है। इस व्रत का फल सैकड़ों यज्ञों के फल की प्राप्ति से भी ज्यादा होता है। सिर्फ संतान ही नहीं बल्कि परिवार में सुख समृद्धि की प्राप्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है।

छठ पूजा का इतिहास:

पौराणिक कथा के अनुसार, एक राजा था जिसका नाम प्रियंवद था। राजा की कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए राजा ने यज्ञ करवाया। यह यज्ञ महर्षि कश्यप ने संपन्न कराया और यज्ञ करने के बाद महर्षि ने प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर प्रसाद के रुप में ग्रहण करने के लिए दी। यह खीर खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई लेकिन उनका पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। यह देख राजा बेहद व्याकुल और दुखी हो गए। राजा प्रियंवद अपने मरे हुए पुत्र को लेकर शमशान गए और पुत्र वियोग में अपने प्राण त्यागने लगे।

इस समय ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। देवसेना ने राजा से कहा कि वो उनकी पूजा करें। ये देवी सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं। यही कारण है कि ये छठी मईया कही जाती हैं। जैसा माता ने कहा था ठीक वैसे ही राजा ने पुत्र इच्छा की कामना से देवी षष्ठी का व्रत किया। यह व्रत करने से राजा प्रियंवद को पुत्र की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि छठ पूजा संतान प्राप्ति और संतान के सुखी जीवन के लिए किया जाता है।

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