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माथे पर सिंदूर लगाने के होते है वैज्ञानिक कारण

[Edited By: Vijay]

Wednesday, 18th November , 2020 04:45 pm

सिंदूर का नाम सुनते ही लोगों के मन में दो ख्याल आते है, पहला औरत की मांग और दूसरा सिंदूर का रंग। लाल रंग का सिंदूर शादी-शुदा औरतों के लिए आनंदमय खुशी का प्रतीक होता है, वहीं पीले रंग का मतलब ताकत, स्वास्थ्य, और सुंदरता से जुड़ा है। प्राचीन समय से ही सनातन धर्म में सिंदूर शादी-शुदा स्त्री का परिचय अथवा उसके समाजिक व्यवहार का क्रम(सिलसिला) चला आ रहा है। बीच में एक समय ऐसा भी आया जब इसको टकियानूसी बातें समझकर दरकिरनार कर दिया गया, लेकिन आज आलम यह है कि इसे केवल रीति-रिवाज समझने या मानने वाली औरतें ही लगाती है। आज भी अगर देखें तो वेस्टर्न कल्चर आने के बावजूद अभी भी सिंदूर का प्रचलन कम जरूर हुआ है, लेकिन समाप्त नहीं हुआ है। आज के समय में अब हिन्दू धर्म के हर वर्ग की लड़कियां सिंदूर लगाती हैं। किसी के लिए खुशियों के उम्मीद की किरण है, तो किसी के लिए सुख-समृद्धि, वहीं अगर बात करें तो आज यह फेमनिस्त के लिए एक फैशन बन चुका है। वहीं दूसरी तरफ सामान्य औरत के लिए एक परंपराओं का ग्रहण है, जिसे उसको किसी भी हालत में निभाना पड़ता है।

  

सिंदूर को आनंदमय खुशी का प्रतीक माना जाता है। यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि क्या कारण हैं कि हिंदू समाज में औरतें सिंदूर से मांग भरती हैं।

 

सुहागन के 16 शृंगार से में एक सिंदूर उसके अखंड सुहागन होने की निशानी होती है। सिंदूर में मर्करी यानी पारा धातु मिला होता है। इसको माथे पर लगाने से शीतलता मिलती है और दिमाग तनावमुक्त रहता है और रक्त संचार को बढ़ाता है।

                  

 माथे पर में जहां सिंदूर लगाया जाता है, वह स्थान ब्रह्मरंध्र और अध्मि नामक मर्म के ठीक ऊपर होता है। सिंदूर मर्म स्थान को बाहरी बुरे प्रभावों से भी बचाता है।

      

लाल रंग होने की वजह से यह स्त्रियों के चेहरे पर एक अनौखी तरह की सुदंरता की छाप छोड़ता है, और स्त्री के सौन्दर्य में वृद्धि करता है।

                 

सिंदूर में सीसा और पारा युक्त धातू होती है जो स्त्री के अधिक थकान होने पर मष्तिक पर ठंडक प्रदान करता है।

 क्या है इसका धार्मिक महत्व?

             

हिन्दू धर्म में सिंदूर को लेकर बहुत सारे तथ्य उपलब्ध है, हिन्दू धर्म में सिंदूर और उसकी सिंदूरदानी का इतिहास लगभग पाँच हजार वर्ष पुराना है। धार्मिक वेदों और पुराणों में भी इसका उल्लेख है, बताया गया है माता पार्वती और माता सीता भी मांग में सिंदूर भरती थी। मांग में सिंदूर लगाने का मतलब मनोकामना की प्रार्थना होती है, जो सभी स्त्रियों की अलग-अलग हो सकती हैं, इसके अनुसार माता पार्वती जी का सिंदूर लगाने की मनोकामना थी, अपने पति शिव जी को बुरी शक्तियों से बचाना, तो वहीं सीता माता की मनोकामना अपने पति श्री राम के लंबी उम्र और खुशी की थीं। विश्व में विख्यात महाकाव्य महाभारत में उल्लेख है किं द्रौपदी घृणा और निराशा के कारण अपने माथे से सिंदूर को पोंछ देतीं है।

              

धार्मिक वेदों और पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ लक्ष्मी का पृथ्वी पर पाँच जगहों पर वास होता है जिसमें एक स्थान सिर यानि माथा है, इसलिए शादी- शुदा औरत अपने मांग में सिंदूर लगाती है किं उनके घर में धन की बढ़ोत्तरी हो, और घर परिवार में सुख समृद्धि की वृद्धि हो।

              

हिन्दू धर्म में सिंदूर का प्रचलन भले ही सदियों से चला आ रहा हो, लेकिन आज के आधुनिक जमाने में सिंदूर लगाने का मतलब विवाहित महिला होने का साक्ष्य और अपने पति के लंबे उम्र की मनोकामना और मन की खुशी होती है।

 

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