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प्राचीन शास्त्रों में भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे कहते हैं ''नवधा भक्ति'' 

[Edited By: Gaurav]

Sunday, 12th April , 2020 12:47 am

प्राचीन शास्त्रों में भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे  ''नवधा भक्ति'' कहते हैं। आइये जानते हैं नवधा भक्ति के बारे में विस्तार से....

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव ), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।

श्रवण: ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।

कीर्तन: ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।

स्मरण: निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना।

पाद सेवन: ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्व समझना।

अर्चन: मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।

वंदन: भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।

दास्य: ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।

सख्य: ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना।

आत्मनिवेदन: अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं।

भगवान् राम शबरीजी के समक्ष नवधा भक्ति का स्वरूप प्रकट करते हुए उनसे कहते हैं कि-

नवधा भकति कहउँ तोहि पाहीं।
सावधान सुनु धरु मन माहीं।।

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

गुर पद पकंज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।

मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।
पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।

छठ दम सील बिरति बहु करमा।
निरत निरंतर सज्जन धरमा।।

सातवँ सम मोहि मय जग देखा।
मोतें संत अधिक करि लेखा।।

आठवँ जथालाभ संतोषा।
सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।

नवम सरल सब सन छलहीना।
मम भरोस हियँ हरष न दीना।।

भक्ति प्रेम की मधुमती भूमिका है। प्रेम का तत्व या सारांश ही भक्ति की संज्ञा को प्राप्त हो जाता है।

प्रभु श्रीराम एवं भक्त शबरी के संवाद के माध्यम से भक्तियोग का जो प्रतिपादन श्रीरामचरितमानस में किया गया है, वह अपने आप में अति उत्तम है।

जैसा कि श्री अवध धाम मंदिर के संस्थापक एवं प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित दाऊजी महाराज ने बताया....

हनुमान जी के भक्ति नवधा भक्ति से विशेष है। शास्त्रों के अंदर नवधा भक्ति की व्याख्या आई है या यह कहें कि नवधा भक्ति का गुणगान शास्त्रों ने भी किया है, लेकिन यदि नवधा भक्ति से विशिष्ट इस कलिकाल के अंदर कुछ है तो वह हनुमान जी की भक्ति है।

शास्त्रों में या मानस पुराणों में उपनिषदों में आया है कि जब ब्रम्हांडनायक श्रीराम अपनी लीला को समाप्त करके अपने लोक को जाने लगे, तब हनुमान जी को परमपिता परमात्मा श्रीराम ने यह आदेश दिया कि वह यहीं पर विराजमान रहकर जब तक इस धरातल पर नाम संकीर्तन राम संकीर्तन व जप तप नियम करते रहेंगे। तब तक हनुमंत लाल आप भी इस धरती पर रहकर दीन दुखियों की रक्षा करना गौ ब्राह्मणों की रक्षा करना। ऐसा आदेश प्रभु राम ने हनुमंत लाल को अपने लोक जाने से दिया था।

अपने भक्तों की रक्षा करते हैं हनुमानजी

हनुमान जी महाराज कलयुग में साक्षात रूप से विराजमान होकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। हरिनाम संकीर्तन के लिए हम सबके हृदय के अंदर अनुराग पैदा करते हैं। भक्ति पैदा करते हैं। शक्ति का संचय और संचार दोनों ही हम भक्तों के हृदय के अंदर हनुमंत लाल ही प्रकट करते हैं। आज इस धरातल के ऊपर जीवन के अंदर किसी न किसी रूप में व्यक्ति दुखी होकर अपना जीवन यापन कर रहा है। कोई तन से दुखी है ताे कोई मन से दुखी है, कोई आदर से दुखी है, कोई निरादर से दुखी है। आज जीवन में दुखद बात यह है कि हम बड़े तो जल्दी हो जाते हैं लेकिन समझदार देर से हो पाते हैं और जब हम समझदार नहीं हो पाते और बड़े हो जाते हैं तो निरादर के पात्र हो जाते हैं।

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