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कैसे आज़ादी की उस शाम उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई लाल किले में गूंजी थी

[Edited By: Arshi]

Saturday, 21st August , 2021 01:23 pm

दुनिया के संगीत से जोड़ने वाले कई लोग आए उन्हीं में से शहनाई की सुरीली तान से दुनिया का परिचय कराने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की आज पुण्यतिथि है. इस मौके पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. सीएम योगी ने ट्वीट करके लिखा, ‘भारत रत्न’ से सम्मानित महान शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की पुण्यतिथि पर उन्हें सादर श्रद्धांजलि. आपकी शहनाई से निकले सुमधुर स्वर, संगीत प्रेमियों की स्मृतियों में सदैव जीवंत रहेंगे. वे अपनी शहनाई को बेगम कहते थे और उसी के साथ 21 अगस्त 2006 को इस दुनिया से रुखसत हुए थे.

 

बिहार के डुमरांव के ठठेरी बाजार में बिस्मिल्लाह खान का जन्म हुआ था. बिस्मिल्लाह खान को शहनाई का जादूगर कहा जाता था. कहते हैं कि जब 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली थी तो बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की धुन दिल्ली में बजी थी. 26 जनवरी को भी उनकी धुन ने चार चांद लगाए थे.

उनका जन्म बिहारी मुस्लिम परिवार में भिरंग राउत की गलीम, डुमरांव, बिहार में 21 मार्च 1916 को हुआ. वह पैगंबर खान और मिथन के दूसरे बेटे थे, जिन्हें अपने भाई शमसुद्दीन के साथ तुकबंदी करने के लिए कमरुद्दीन नाम दिया गया. बिस्मिल्लाह खान के पूर्ववर्ती दरबारी संगीतकार थे और वे भोजपुर की रियासतों में नक्कार खाना में प्रदर्शन करने के आदी थे. बिस्मिल्लाह खान के पिता बिहार के डुमरांव एस्टेट के महाराजा केशव प्रसाद सिंह दरबार में शहनाई बजाते थे.
उन्हें बिस्मिल्लाह नाम उनके दादा ने दिया था. कहा जाता है कि जब उनका जन्म हुआ था, तब बरबस ही उनके दादा के मुंह से बिस्मिल्लाह निकल गया था. तब से उनका नाम बिस्मिल्लाह पड़ गया था. एक बार जब वे ईद मनाने बनारस अपने मामा के घर गए तो वहीं के बनकर रह गए.

जब वह महज़ छह साल के थे, तब वे वाराणसी गए और अपने मामा अली बख्श विलायतु के मार्गदर्शन में अपना प्रशिक्षण पूरा किया. उनके मामा वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे. तब बिस्मिल्लाह भी उनके साथ होते थे. इस तरह शहनाई से उनका रिश्ता कायम हुआ. वे एक असाधारण शहनाई वादक थे, जो शास्त्रीय धुनों को बड़ी सहजता के साथ शहनाई पर बजाते थे. कई बड़े नेताओं के अलावा फिल्म अभिनेता भी उनकी शहनाई वादन के मुरीद थे.


बिस्मिल्लाह खान का भारतीय फिल्मों में एक संक्षिप्त इतिहास रहा. उन्होंने कन्नड़ फिल्म सनदी अपन्ना में राजकुमार की भूमिका के लिए अपनी शहनाई निभाई है. उन्होंने जलसागर (सत्यजीत रे की एक फिल्म) में अभिनय किया और 1959 में गूंज उठी शहनाई में शहनाई की भूमिका निभाई. फिल्म निर्देशक गौतम घोष ने बिस्मिल्लाह खान के जीवन पर बने मिले मिल से मुलकत का निर्देशन किया. 

उस्ताद सरस्वती के महान अनुयायी थे. वह कई भारतीय संगीतकारों के भी प्रशंसक थे और वाराणसी में गंगा नदी के तट पर प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर सहित हिंदू मंदिरों में शहनाई बजाते थे. उन्होंने दिव्य गुरु प्रेम रावत के लिए प्रदर्शन किया.

1937 में अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन कलकत्ता में उन्होंने शहनाई को भारतीय संगीत का केंद्र मंच दिया. वह भारतीय शास्त्रीय संगीत के सर्वश्रेष्ठ संगीतकारों में से एक थे और वे शहनाई और हिंदू-मुस्लिम एकता पर अपने एकाधिकार के लिए प्रसिद्ध हैं.

इंदिरा गांधी उनकी शहनाई सुनने के लिए, अक्सर उन्हें आमंत्रित किया करती थीं. उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को संगीत में उनके योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया था. उन्हें 2001 में भारत रत्न ने सम्मानित किया गया था.

15 अगस्त, 1947 को जैसे ही भारत ने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपना पहला कदम उठाया, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई के मीठी धुन ने लाल किले को भर दिया उस दिन देश ने अपनी स्वतंत्रता का जश्न मनाया. शहनाई वादक ने पाकिस्तान जाने के बजाय भारत में रहने का विकल्प चुना. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान एक पथप्रदर्शक संगीतकार थे जिन्होंने न केवल शहनाई को सबसे आगे लाया, बल्कि एकता के दर्शन को भी मूर्त रूप दिया.

उन्होंने शायद ही कभी छात्रों को स्वीकार किया. उन्होंने सतगुरु जगजीत सिंह जी (नामधारी सिखों के वर्तमान गुरु) से मुलाकात की और बहुत ही प्रतिभाशाली युवा बलजीत सिंह नामधारी को शहनाई बजाते देखा. बिस्मिल्लाह खान ने एक छात्र के रूप में बलजीत सिंह नामधारी का स्वागत किया. उन्होंने 1999 में दो और छात्रों, कृपाल सिंह और गुरबख्श सिंह नामधारी को शहनाई बजाते हुए स्वीकार किया. उनके एक अन्य छात्र उस्ताद हसन भाई हैं.

17 अगस्त 2006 को उन्हें बीमारी हो गई और उन्हें इलाज के लिए हेरिटेज अस्पताल, लंका वाराणसी में भर्ती कराया गया. 21 अगस्त 2006 को अस्पताल में भर्ती होने के चार दिन बाद ही क्रॉनिक कार्डिएक अरेस्ट के कारण उनका निधन हो गया.

अपने पूरे जीवन में उन्होंने दुनिया भर में अपने दर्शकों के लिए शहनाई बजाई और अपने संगीत के माध्यम से शांति और प्रेम का संदेश फैलाया. वह अपनी कला के लिए पूरी तरह से समर्पित थे और यहां तक ​​कि यह भी माना जाता है कि उन्होंने अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपनी शहनाई को अपनी बेगम के रूप में संदर्भित किया. उनकी मृत्यु पर उनके शव के साथ शहनाई को भी दफना दिया गया.भारत सरकार ने उनके मृत्यु दिवस को राष्ट्रीय शोक का दिन घोषित किया. उनके पार्थिव शरीर को उनकी बेगम शहनाई के साथ वाराणसी के फतेमेन कब्रिस्तान में नीम के पेड़ के नीचे दफनाया गया. भारतीय सेना की ओर से 21 तोपों की सलामी के साथ उनके पार्थिव शरीर को दफनाया गया.

वह एक धर्मनिष्ठ मुस्लिम थे, जो अन्य धर्मों और विश्वासों को समान सम्मान देते थे. अपने उच्च नैतिकता, सादगी और चरित्र की ताकत के लिए जाने जाने वाले एक व्यक्ति, खान ने अपने आकर्षण और जादुई प्रदर्शन के साथ दुनिया भर में जीत हासिल की.

 

 

 

 

 

 

 

 

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