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क्या इंसानों का वही हाल होने वाला है जो डायनोसोर का हुआ था?, होश उड़ा देगी ये रिपोर्ट

[Edited By: Gaurav]

Tuesday, 18th June , 2019 01:35 pm

ये वो समय है जब इंसान की नस्ल जलवायु परिवर्तन, परमाणु युद्ध, महामारी या धरती से उल्का पिंड के टकरा जाने के जानलेवा ख़तरों का सामना कर रही है। रेडियो ब्राडकॉस्टर और दार्शनिक डेविड एडमंड्स ने इन मामलों के विशेषज्ञों से बात कर ये जानने की कोशिश की कि क्या इस शताब्दी के अंत तक इंसान का वजूद मिट तो नहीं जाएगा। 

सबसे बड़ा ख़तरा क्या है?

डोडो चिड़िया
Image captionअगर समय के साथ जीवों की अन्य प्रजातियां लुप्त हुईं तो इंसान ही क्यों अपवाद? डोडो चिड़िया जो विलुप्त हो चुकी है। बीबीसी की एक रिपोर्ट में ऑक्सफ़ोर्ड के फ्यूचर ऑफ़ ह्यूमैनिटीज़ इंस्टीट्यूट से जुड़े शोधकर्ता एंडर्स सैंडबर्ग के अनुसार,"मानव जाति के सामने लुप्त होने का ऐसा ख़तरा है जो पूरी कहानी ख़त्म कर देगा।"

20वीं शताब्दी तक हम सोचते थे कि हम बहुत सुरक्षित जगह रह रहे हैं लेकिन अब स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है। मानव जाति के लुप्त होने के ख़तरे, चिंताजनक रूप से बहुत अधिक और बहुत तरह के बढ़ गए हैं। इसके कुछ उदाहरण लिए जा सकते हैं। 

उल्का पिंड के टकराने का ख़तरा
1980 के दशक तक हमें नहीं लगता था कि आकाश से गिरने वाले उल्का पिंडों की वजह से धरती पर कोई महाविनाश आएगा। लेकिन इसी दशक में वैज्ञानिक बाप-बेटे लुईस और वॉल्टर एवारेज़ ने एक अवधारणा रखी कि उल्का पिंडों की वहज से सारे डायनासोर मारे गए। जब मैक्सिको की यूकटान खाड़ी में एक बड़े गढ्ढे का पता चला, इसके बाद हाल ही में वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय पैनल ने भी इस विचार का समर्थन किया है। हालांकि उल्कापिंड के टकराने से विनाश की संभावना अभी बहुत दूर है, बल्कि उससे ज्यादा ख़तरा हम खुद पैदा कर रहे हैं।

जनसंख्या की अतिवृद्धि, स्रोतों का क्षय और जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन से आने वाले ख़तरों से हम परिचित हैं लेकिन लंदन विश्वविद्यालय की शोधकर्ता कैरिन कुल्हेमन जनसंख्या वृद्धि पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं। घटते प्राकृतिक संसाधनों के साथ इसकी ख़बरें शायद ही सुर्खियां बनती हैं, क्योंकि हमें बुरा लगता है और इसलिए हम इस पर सोचना नहीं चाहते। कैरिन के अनुसार, अन्य चीजें, जिससे इंसानी आबादी सामूहिक कब्र में दफ़्न हो सकती है, जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि का मसला भी आपसे में जुड़ा हुआ है। उनके मुताबिक, जनसंख्या वृद्धि का जलवायु परिवर्तन पर ख़ासा असर है क्योंकि संसाधन ख़त्म हो रहे हैं और उनका दोहन बढ़ रहा है और ये जलवायु परिवर्तन को और भयावह बना रहा है। वो कहती हैं कि अगर जनसंख्या वृद्धि रुक भी जाए तो जलवायु परिवर्तन को रोकना एक असंभव काम हो सकता है। 

जैव विविधता का विनाश
कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि इस सदी के मध्य तक आते आते व्यावसायिक मछली पकड़ने के उद्योग के लिए समंदर में पर्याप्त मछलियां नहीं बचेंगी। इसका मतलब है कि दुकानों में खरीदने के लिए मछली, चिप्स या फ़िश करी नहीं मिलेगी। कीट पतंगे भी तेजी से लुप्त हो रहे हैं और इसके साथ ही चिड़ियों की कई किस्में ख़त्म हो रही हैं क्योंकि इनका भोजन वो कीट हैं जो अब बचे ही नहीं। कैरिन कहती हैं कि हम नहीं जानते कि ख़त्म होती जैव विविधता का क्या असर होगा लेकिन ऐसा ज़रूर लगता है कि इसका हमारे ऊपर सबसे बुरा असर पड़ने वाला है।  

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