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लमही गांव में जन्मे कहानीकार मुंशी प्रेमचंद जी की कहानी

[Edited By: Aviral Gupta]

Friday, 31st July , 2020 06:12 pm

मै एक मजदूर हूं जिस दिन कुछ लिख न लूं , उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं .. ये वाक्य हिंदी के महान कहानीकार मुंशी प्रेमचंद जी के हैं ... मुंशी प्रेमचंद जी की किताबों और कहानियों से हमारा बचपन से ही सामना होता रहा है. उनकी कहानियों ने लाखों-करोड़ों लोगों के दिमाग पर अमिट छाप छोड़ी है और आज भी उन्हें भारत के सबसे महत्वपूर्ण लेखक के तौर पर शुमार किया जाता है. हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक मुंशी प्रेमचंद की आज जयंती है। उनका हिंदी साहित्य में योगदान का कोई जोड़ नहीं है। उनके लिखे उपन्यास और कहानियों की देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के पाठकों के दिल में एक खास जगह है। मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गांव में एक कायस्थ परिवार में हुआ था.. प्रेमचंद ने डेढ़ दर्जन उपन्यास और 300 से अधिक कहानियां लिखीं हैं।

यह इत्तेफाक ही था कि 1916 में यहां के एक विद्यालय में शिक्षक के रूप में तैनात हुए और 5 वर्ष तक शिक्षक कार्य को बखूबी निभाने के बाद गांधी जी के भाषण से प्रभावित होकर अंग्रेजी सरकार की गुलामी की हुकूमत को तिलांजलि देते हुए सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे वाराणसी लौट गए। आज भी गोरखपुर में स्थित प्रेमचंद पार्क शहरवासियों के लिए खास बना हुआ है। इसमें बना हुआ निकेतन साहित्यप्रेमियों के लिए खास महत्व रखता है क्योंकि यही वह निकेतन है जहाँ मुंशी प्रेमचंद ने कई कालजयी रचनाओं को लिखा है।
मुंशी प्रेमचंद ने 5 वर्ष इसी निकेतन में रहकर ईदगाह, नमक का दरोगा जैसी कहानियों की रचना की। गोरखपुर के बेतियाहाता में स्थित प्रेमचंद पार्क में प्रेमचंद निकेतन मौजूद है। 1904 में स्थापित इस निकेतन को धरोहर समझकर इसके इर्द गिर्द 1989 में पार्क बना दिया गया और मुंशी प्रेमचंद पार्क का नाम दे दिया गया। इसी निकेतन में रहकर नमक का दरोगा, ईदगाह, कफ़न, बूढ़ी काकी जैसी कहानियों की रचना की। ये सभी वे कहानियां हैं जिन्हें आज भी हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है

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