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भारत के साथ सीमा विवाद के बीच नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी

[Edited By: Rajendra]

Wednesday, 20th May , 2020 03:19 pm

रोटी-बेटी' के साथ वाले नेपाल में अचानक से भारत विरोध की आंच तेज हो गई है। लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद और गहराता जा रहा है। नेपाल का नया नक्‍शा जारी करने के ऐलान के बाद नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भारत पर 'सिंहमेव जयते' का तंज कसा। यही नहीं नेपाल इन भारतीय इलाकों में अपनी हथियार बंद उपस्थिति भी बढ़ा रहा है।

भारत के साथ सीमा विवाद के बीच नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी करके नया विवाद खड़ा कर दिया है. इस नक्शे में लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाली क्षेत्र में दर्शाया गया है. इस बीच, नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मंगलवार को नेपाल के इस दावे को एक बार फिर दोहराया है. इस संबंध में एक सांसद द्वारा सवाल पूछे जाने पर ओली ने कहा कि इन क्षेत्रों को वापस लाने के लिए कूटनीतिक प्रयास किए जाएंगे.
केपी शर्मा ने कहा, "जिम्मेदार सरकार के मुखिया के रूप में, मैं सदन को बताना चाहता हूं कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी के मुद्दे को छोड़ नहीं जाएगा. इस संबंध में ठोस निष्कर्ष निकाला जाएगा. हम इस मुद्दे को धूमिल नहीं होने देंगे और राजनयिक वार्ता के जरिए इसका समाधान किया जाएगा तथा क्षेत्रों को फिर से हासिल किया जाएगा."

भारत और नेपाल के वर्तमान विवाद की शुरुआत 1816 में हुई थी। तब ब्रिटिश हुकुमत के हाथों नेपाल के राजा कई इलाके हार गए थे। इसके बाद सुगौली की संधि हुई जिसमें उन्‍हें सिक्किम, नैनीताल, दार्जिलिंग, लिपुलेख, कालापानी को भारत को देना पड़ा था। हालांकि अंग्रेजों ने बाद में कुछ ह‍िस्‍सा लौटा द‍िया। यही नहीं तराई का इलाका भी अंग्रेजों ने नेपाल से छीन ल‍िया था लेकिन भारत के वर्ष 1857 में स्‍वतंत्रता संग्राम में नेपाल के राजा ने अंग्रेजों का साथ दिया था। अंग्रेजों ने उन्‍हें इसका इनाम दिया और पूरा तराई का इलाका नेपाल को दे द‍िया।

तराई के इलाके में भारतीय मूल के लोग रहते थे लेकिन अंग्रेजों ने जनसंख्‍या के विपरीत पूरा इलाका नेपाल को दे द‍िया। नेपाल मामलों पर नजर रखने वाले एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने बताया कि वर्ष 1816 के जंग में हार की कसक नेपाल के गोरखा समुदाय में आज भी बना हुआ है। इसी का फायदा वहां के राजनीतिक दल उठा रहे हैं। उन्‍होंने बताया कि दोनों देशों के बीच जारी इस विवाद में एक दिक्‍कत यह भी है कि नेपाल कह रहा है कि सुगौली की संधि के दस्‍तावेज गायब हो गए हैं।

गयावली ने भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा को पिछले हफ्ते तलब किया था और लिपुलेख को जोड़ने वाले प्रमुख मार्ग के निर्माण के खिलाफ विरोध जताने के लिए कूटनीतिक नोट सौंपा था. भारत ने कहा था कि उत्तराखंड के पिथौड़ागढ़ जिले में हाल में उद्घाटित सड़क मार्ग पूरी तरह उसकी सीमा के भीतर आता है. नेपाल के वित्त मंत्री एवं सरकार के प्रवक्ता युवराज खाटीवाड़ा ने सोमवार को कहा कि प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल ने देश के नये राजनीतिक मानचित्र को स्वीकृत किया है.

मधेसियों और भारत के लोगों में रोटी-बेटी का साथ है। भारत के नाकेबंदी के बाद भी नेपाल ने अपने संविधान में कोई बदलाव नहीं किया और नाकाबंदी बिना किसी सफलता के खत्‍म करनी पड़ी। भारतीय अधिकारी ने बताया कि नेपाल में मधेसियों के साथ भेदभाव के आरोप में काफी हद तक सच्‍चाई है। नेपाल में सरकारी नौकरियों में पहाड़‍ी समुदाय का कब्‍जा है। मधेसियों को पहाड़ी लोग घृणा की दृष्टि से देखते हैं। नेपाल में मधेसियों को 'धोती' कहकर च‍िढ़ाया जाता है। पहाड़ी ये समझते हैं कि मधेसी लोग नेपाल के प्रति नहीं बल्कि भारत के प्रति अपनी न‍िष्‍ठा रखते हैं।

नेपाल में इन दिनों राजनीति में वामपंथियों का दबदबा है। वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा भी वामपंथी हैं और नेपाल में संविधान को अपनाए जाने के बाद वर्ष 2015 में पहले प्रधानमंत्री बने थे। उन्‍हें नेपाल के वामपंथी दलों का समर्थन हासिल था। केपी शर्मा अपनी भारत विरोधी भावनाओं के लिए जाने जाते हैं। वर्ष 2015 में भारत के नाकेबंदी के बाद भी उन्‍होंने नेपाली संविधान में बदलाव नहीं किया और भारत के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के लिए केपी शर्मा चीन की गोद में चले गए। नेपाल सरकार चीन के साथ एक डील कर ली। इसके तहत चीन ने अपने पोर्ट को इस्तेमाल करने की इजाज़त नेपाल को दे दी।


भारत और नेपाल के बीच 'कालापानी बॉर्डर' का मुद्दा एक बार फिर से सुर्खियों में है। नेपाल इस मुद्दे पर भारत से बात करना चाहता है। नेपाल का कहना है कि आपसी रिश्तों में दरार पड़ने से रोकने के लिए कालापानी मुद्दे को सुलझाना अब बहुत जरूरी है।

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