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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यून ने लगाई यूपी सरकार को फटकार- जाने क्यो

[Edited By: Vijay]

Saturday, 19th June , 2021 02:24 pm

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 40 साल बाद भी ठोस कचरे के वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण में नाकाम रहने के लिए शुक्रवार को उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई। एनजीटी ने कहा, ऐसा लगता है कि राज्य के अफसर खुद को कानून से ऊपर मानते हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी नियमों की अनदेखी कर रहे हैं। उसने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है और इसमें ठोस कार्रवाई की जरूरत है।

एनजीटी अध्यक्ष जस्टिस एके गोयल की पीठ ने वायु गुणवत्ता और जन स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले ठोस कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण में नाकामी का उल्लेख किया। यूपी निवासी अरविंद कुमार और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मौजूदा नियम बनने के पांच साल बाद और वायु प्रदूषण (निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम-1981 के 40 साल बाद भी अधिकारी ठोस कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण करने में असफल रहे हैं। 

साथ ही यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) और बिजनौर के जिलाधिकारी को कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही दोनों को ई-मेल के जरिये कार्रवाई रिपोर्ट भी पेश करने का आदेश दिया।

निर्देश का पालन नहीं हुआ तो करेंगे दंडात्मक कार्रवाई

पीठ ने कहा कि उसके निर्देश के अनुरूप अगर संतोषजनक कदम नहीं उठाए गए तो वह संबंधित अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करेगी। एनजीटी ने कहा कि ठोस कचरे के वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण की योजना शहरी विकास सचिव द्वारा तैयार राज्य नीति के नियम 11 के अनुरूप बनाई जानी चाहिए।

एनजीटी ने वरुणा व अस्सी नदी के पुनरुद्धार के लिए बनाई समिति

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने वाराणसी में गंगा से जुड़ने वाली दो सहायक नदियों वरुणा और अस्सी के पुनरुद्धार के लिए एक समिति का गठन किया है। एनजीटी ने यह कदम इन दोनों नदियों में बिना शोधित सीवेज का कचरा डालने के मामले में एक याचिका का संज्ञान लेते हुए उठाया। याचिका में कहा गया है कि कचरे के अलावा नदियों में अवैध निर्माण भी हो रहे हैं।

एनजीटी पीठ ने इसके लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय निर्मल गंगा मिशन और वाराणसी के जिलाधिकारी की सदस्यता वाली स्वतंत्र निगरानी समिति बनाई है। यह समिति दो हफ्ते के अंदर बैठक कर कार्ययोजना की समीक्षा करेगी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर निर्मल गंगा मिशन को 4 अगस्त से पहले कार्रवाई कर रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा गया है।

NGT का महत्त्व

विगत वर्षों में NGT ने पर्यावरण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और जंगलों में वनों की कटाई से लेकर अपशिष्ट प्रबंधन आदि के लिये सख्त आदेश पारित किये हैं।

NGT ने पर्यावरण के क्षेत्र में न्याय के लिये एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र (Alternative Dispute Resolution Mechanism) स्थापित करके नई दिशा प्रदान की है।

इससे उच्च न्यायालयों में पर्यावरण संबंधी मामलों का भार कम हुआ है।

पर्यावरण संबंधी मुद्दों को सुलझाने के लिये NGT एक अनौपचारिक, मितव्ययी एवं तेज़ी से काम करने वाला तंत्र है।

यह पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

चूँकि अधिकरण का कोई भी सदस्य पुनः नियुक्ति के योग्य नहीं होता है और इसीलिये वह बिना किसी भय के स्वतंत्रता-पूर्वक निर्णय सुना सकता है।

चुनौतियाँ

दो महत्त्वपूर्ण अधिनियमों [वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) तथा अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी अधिनियम, 2006 (Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers Act, 2006)] को NGT के अधिकार-क्षेत्र से बाहर रखा गया है, लेकिन इससे कई बार NGT के काम-काज प्रभावित होता है, क्योंकि पर्यावरण से जुड़े कई मुद्दे इन अधिनियमों के अधीन आते हैं।

NGT के कई निर्णयों को उच्च न्यायालय में धारा 226 के तहत यह कहकर चुनौती दी जाती रही है कि उच्च न्यायालय एक संवैधानिक संस्था है, जबकि अधिकरण एक वैधानिक संस्था है। यह इस अधिनियम की सबसे बड़ी खामी है कि इसमें यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है कि किन मुकदमों को न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है और किन को नहीं।

आर्थिक वृद्धि और विकास पर प्रभाव डालने के कारण NGT के निर्णयों की समय-समय पर आलोचना होती रहती है।

मुआवज़े के निर्धारण की कोई स्पष्ट विधि न होने के कारण भी अधिकरण आलोचना का शिकार हो जाता है।

NGT के लिये यह अनिवार्य है कि उसके अधीन जो भी मुकदमा आए उसका निपटारा 6 महीनों के भीतर हो जाना चाहिये, परंतु मानव और वित्तीय संसाधनों के अभाव में NGT ऐसा नहीं कर पाता है।

NGT का न्यायिक तंत्र भी सीमित संख्या में क्षेत्रीय पीठों (Regional Benches) के कारण बहुत अधिक प्रभावित होता है।

 

 

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