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पृथ्वी के 4 चक्कर लगाकर चंद्रयान-2 ने छोड़ी कक्षा, 6 दिन बाद पहुंचेगा चंद्रमा के ऑर्बिट में

[Edited By: Gaurav]

Wednesday, 14th August , 2019 12:52 pm

मंगलवार रात 2 बजकर 21 मिनट पर चंद्रयान-2 ने पृथ्वी की कक्षा को छोड़ दिया। अब वह चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश करने के लिए निकल चुका है। इस प्रक्रिया को ट्रांस लुनर इंसर्शन (टीएलआई) कहा जाता है, जिसमें इसरो को सफलता मिली। इससे पहले चंद्रयान-2 पृथ्वी की कक्षा में 23 दिन रहा और ग्रह के चार चक्कर लगाए। इसरो ने आंध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा से 22 जुलाई को मून मिशन लॉन्च किया था।

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इसरो चेयरमैन के.सिवन ने बताया कि चंद्रयान-2 को चंद्रमा की कक्षा तक पहुंचने में 6 दिन का समय लगेगा। चंद्रयान-2 ने सफलतापूर्वक लुनर ट्रांसफर ट्राजेक्टरी सिस्टम में प्रवेश कर लिया है। 20 अगस्त को चंद्रयान-2, चंद्रमा की कक्षा में पहुंच जाएगा। पृथ्वी से चंद्रमा के बीच की दूरी 3.84 लाख किलोमीटर है। इसरो के अनुसार, पृथ्वी की अंतिम कक्षा छोड़ने के दौरान यान के इंजन को 1203 सेकंड के लिए चालू किया गया था।

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चंद्रयान-2 तय तारीख को चांद पर पहुंचेगा

मिशन की लॉन्चिंग की तारीख आगे बढ़ाने के बावजूद चंद्रयान-2 चांद पर तय तारीख यानी 7 सितंबर को ही पहुंचेगा। इसे समय पर पहुंचाने का मकसद यही है कि लैंडर और रोवर तय शेड्यूल के हिसाब से काम कर सकें। समय बचाने के लिए चंद्रयान ने पृथ्वी का एक चक्कर कम लगाया। पहले 5 चक्कर लगाने थे, पर बाद में इसे चार किया गया। इसकी लैंडिंग ऐसी जगह तय है, जहां सूरज की रोशनी ज्यादा है। रोशनी 21 सितंबर के बाद कम होनी शुरू होगी। लैंडर-रोवर को 15 दिन काम करना है, इसलिए समय पर पहुंचना जरूरी है।

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चंद्रयान-2 का वजन 3,877 किलो

चंद्रयान-2 को भारत के सबसे ताकतवर जीएसएलवी मार्क-III रॉकेट से लॉन्च किया गया। इस रॉकेट में तीन मॉड्यूल ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) हैं। इस मिशन के तहत इसरो चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर को उतारने की योजना है। इस बार चंद्रयान-2 का वजन 3,877 किलो है। यह चंद्रयान-1 मिशन (1380 किलो) से करीब तीन गुना ज्यादा है। लैंडर के अंदर मौजूद रोवर की रफ्तार 1 सेमी प्रति सेकंड है।

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चंद्रयान-2 मिशन क्या है?

चंद्रयान-2 वास्तव में चंद्रयान-1 मिशन का ही नया संस्करण है। इसमें ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) शामिल हैं। चंद्रयान-1 में सिर्फ ऑर्बिटर था, जो चंद्रमा की कक्षा में घूमता था। चंद्रयान-2 के जरिए भारत पहली बार चांद की सतह पर लैंडर उतारेगा। यह लैंडिंग चांद के दक्षिणी ध्रुव पर होगी। इसके साथ ही भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर यान उतारने वाला पहला देश बन जाएगा।

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ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर क्या काम करेंगे?

चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद ऑर्बिटर एक साल तक काम करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी और लैंडर के बीच कम्युनिकेशन करना है। ऑर्बिटर चांद की सतह का नक्शा तैयार करेगा, ताकि चांद के अस्तित्व और विकास का पता लगाया जा सके। वहीं, लैंडर और रोवर चांद पर एक दिन (पृथ्वी के 14 दिन के बराबर) काम करेंगे। लैंडर यह जांचेगा कि चांद पर भूकंप आते हैं या नहीं। जबकि, रोवर चांद की सतह पर खनिज तत्वों की मौजूदगी का पता लगाएगा।

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