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लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर

[Edited By: Gaurav]

Tuesday, 11th June , 2019 02:51 pm

प्राचीन इतिहास के अनुसार यह माना जाता है कि वैदिक काल के दौरान मंदिर मौजूद नहीं थे। सबसे पहले मंदिर की संरचना सुरक कोटल में पाई गई थी जो कि 1951 में एक फ्रांसीसी पुरातत्वविद् द्वारा अफगानिस्तान में एक जगह पर बताई गई  है। मंदिर 121-151 ईसवीं के राजा कनिष्क को समर्पित था। अंततः मूर्ति पूजा का महत्व वैदिक काल के अंत की ओर बढ़ने लगा और इस प्रकार देवताओं के लिए मंदिरों की अवधारणा प्रकाश में आई।

लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर

उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर मंदिरों का एक शहर है, जिनमें से कई  तरह की वास्तुकला दिखती है।  लिंगराज मंदिर - इनमें से सबसे बड़ा लगभग एक हजार साल पुराना है। भुवनेश्वर, कोणार्क और पुरी उड़ीसा के स्वर्ण त्रिभुज का निर्माण करता है। यहां तीर्थयात्रियों और पर्यटकों द्वारा बड़ी संख्या में दौरा किया जाता है।

यह 180 फीट ऊंचा भव्य मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसे मंदिर की वास्तुकला की विशुद्ध हिंदू शैली का सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है। लिंगराज मंदिर में जगमोहन, नटमंदिर, भोगमंडप्पा है। यह 7 फीट मोटी दीवार से घिरा है। मंदिर का विशाल प्रांगण 100 से अधिक मंदिरों से भरा है। इस मंदिर में मूर्तियां 1014 ईसवी पूर्व के सोमवमिस की हैं। मंदिर में 13 वीं शताब्दी के कलिंग राजा अनंगभीम  के काल के शिलालेख भी देखे गए हैं।

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